अनकही कहानी तिलिस्मी किले की, जिस पर लिखा गया उपन्यास!

दूरदर्शन पर 90 के दशक में एक धारावाहिक आता था। उस सीरियल का नाम था चंद्रकांता। यह धारावाहिक देवकीनंदन खन्नी के उपन्यास चंद्रकांता पर केंद्रित था।

इस उपन्यास की कहानी में तिलस्म और चुनारगढ़ का जिक्र मिलता है। चंद्रकांता उपन्यास तो काल्पनिक था। लेकिन उसमें मौजूद तिलिस्म और चुनारगढ़ का जिक्र सदियों पुराना रहा है।

क्या होता है तिलिस्म

दरअसल तिलिस्म अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, ‘ इंद्रजालिक रचना, गाड़े हुए धन आदि पर बनायी हुई सर्प आदि की भयावनी आकृति व दवाओं तथा लग्नों के मेल से बंधा हुआ यन्त्र’।

कहते हैं तिलिस्म वही व्यक्ति तैयार करता है, जिसके पास बहुत ज्यादा धन हो और वारिस न हो।

प्राचीन काल में राजाओं को जब तिलिस्म बांधने की इच्‍छा होती थी तो तांत्रिक इकट्ठे किए जाते थे। उन्हीं लोगों द्वारा तिलिस्म बांधने के लिए ज़मीन खोदी जाती थी, उसी ज़मीन के अंदर खजाना रखकर ऊपर तिलिस्मी इमारत बनाई जाती थी।

ज्योतिषी, नजूमी, वैद्य, कारीगर और तांत्रिक लोग अपनी ताकत के मुताबिक उसके छिपाने की बंदिश करते थे मगर इसके साथ ही उस आदमी के नक्षत्र एवं ग्रहों का भी खयाल रखते थे, जिसके लिए वह रखा जाता।

वर्तमान में हम ऐसे कई किस्से सुनते हैं जिनमें तिलिस्म खजाने की बात कही गई होती है। ये तिलिस्मी खजाने किसी पुराने मंदिर, पुरानें किले, पुराने खंडहर में होते हैं।

द्वापरयुग का चुनारगढ़ कनेक्शन

# चुनारगढ़ का किला उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है।

# चुनारगढ़ किले का इतिहास महाभारत काल से भी पुराना है।

# चुनारगढ़ किले का इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है यह किला लगभग 5000वर्षों के इतिहास का गवाह है ।

# चुनारगढ़ किले का निर्माण किस शासक ने कराया है इसका कोई प्रमाण नहीं है इतिहासकारों के अनुसार महाभारत काल में इस पहाड़ी पर सम्राट काल्यवन का कारागार (जेल)था।

# माना जाता है कि योगीराज भतृहरी कि आत्मा आज भी इस पर्वत पर विराजमान है।

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