गठबंधन के बाद मायावती ने उठाया चौकाने वाला कदम , गेस्ट हाउस कांड लिया वापस पढ़िए रिपोर्ट –

लोकसभा चुनाव से पूर्व सपा और बसपा ने ढाई दशक की दुश्मनी को खत्म कर जिस तरह दोस्ती की थी, वह दोस्ती तो नहीं रही, लेकिन 1995 के गेस्ट हाउस कांड में मुलायम सिंह के खिलाफ दर्ज मुकदमा खत्म हो गया है। चुनावी गठबंधन के एक महीने के भीतर मायावती ने सुप्रीम कोर्ट से औपचारिक रूप से मुकदमा वापस ले लिया था। माया ने ऐसा करने का संकेत देकर सपा को उत्साहित तो किया था, लेकिन कभी औपचारिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की। सुप्रीम कोर्ट में बसपा की अपील पूरे 15 साल लंबित रही।

26 फरवरी के आदेश में कोर्ट ने कहा है कि आठ जनवरी को दोनों पक्षों ने संयुक्त रूप से अनुरोध किया था कि उन्हें चार सप्ताह का समय दिया जाए। आठ जनवरी से पहले यह मुकदमा गत वर्ष 19 सितंबर और 14 नवंबर को भी लगा था। इन तारीखों पर भी पक्षकारों ने आपस में समझौते की बातचीत चलने के आधार पर सुनवाई स्थगित करा ली थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 24 फरवरी, 2004 के आदेश को चुनौती देने वाली बसपा की विशेष अनुमति याचिकाओं पर पहली बार नोटिस पांच मई, 2004 को लिया था। 2009 में कोर्ट ने बसपा की विशेष अनुमति याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार किया था, जिसके बाद दोनों विशेष अनुमति याचिकाएं आपराधिक अपील में तब्दील हो गई थीं।

1995 में हुआ था गेस्टहाउस कांड

गेस्टहाउस कांड 1995 की घटना है। बसपा ने उत्तर प्रदेश में सपा की तत्कालीन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। उस समय मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। बसपा का आरोप था कि समर्थन वापस लेने के बाद सपा ने उसके पांच विधायकों का गेस्ट हाउस से अपहरण कर लिया और उन्हें विक्रमादित्य मार्ग ले गए, जहां मुलायम सिंह व अन्य मंत्री मौजूद थे। वहां विधायकों को समर्थन के बदले में 50-50 लाख रुपये और मंत्री पद का प्रलोभन दिया गया। इस केस में आरोपपत्र दाखिल हुआ था। मजिस्ट्रेट ने संज्ञान भी लिया, लेकिन बाद में मजिस्ट्रेट ने आरोपपत्र पर संज्ञान लेने और अभियुक्तों को सम्मन करने का अपना आदेश वापस ले लिया। आदेश वापस लेने के खिलाफ तत्कालीन प्रदेश सरकार हाई कोर्ट गई, लेकिन हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेश वापस लेने को सही ठहराया। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा था कि विधायक पब्लिक सर्वेट नहीं होते। इसलिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून उन पर लागू नहीं होगा। हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बसपा नेता बरखूराम वर्मा और राम अचल राजभर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी। इस मामले में मुलायम सिंह, शिवपाल, आजम खान और सपा के कई वरिष्ठ नेताओं सहित कुल 12 अभियुक्त थे। बरखूराम वर्मा की मृत्यु होने के बाद राम अचल राजभर पैरवी जारी रखे हुए थे।

मंत्री पद की पेशकश भ्रष्टाचार कैसे माना जाएगा

सात सितंबर, 2016 को बसपा की अपील नियमित सुनवाई पर आई थी। उस दिन जस्टिस जेएस खेहर और अरुण मिश्रा की पीठ ने बसपा के वकील केके वेणुगोपाल से पूछा था कि मंत्री पद की पेशकश करना भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में कैसे आएगा? पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा था कि गठबंधन सरकार में दल पहले ही तय कर लेते हैं कि कितने विधायकों को मंत्री बनना है। मंत्री पद गठबंधन सरकार का आधार होता है। ऐसे में मंत्रीपद की पेशकश रिश्वत कैसे माना जाएगा। वेणुगोपाल ने कहा था कि मजिस्ट्रेट भ्रष्टाचार कानून के तहत संज्ञान लेने का अपना आदेश वापस नहीं ले सकता। तब पीठ ने सवाल किया था कि क्या मंत्री पद देना रिश्वत है?

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