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‘तीन तलाक की आड़ में यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे को हवा दे रही है BJP सरकार’

बरेली: सुन्नी मुसलमानों के बाद अब बरेलवी फिरके के मुस्लिमों ने भी तीन तलाक के मुद्दे पर केन्द्र सरकार के रुख के विरोध का झण्डा बुलन्द कर दिया है. ‘उर्स-ए-नूरी’ की शुरुआत के मौके पर दरगाह आला हजरत में हुई बैठक में उलमा ने तीन तलाक के मुद्दे पर दायर केंद्र सरकार के हलफनामे और समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) के बहिष्कार का ऐलान किया.

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केन्द्र सरकार के रुख के विरोध का ऐलान

तीन तलाक के मसले पर देश भर में मचे शोर के बीच दरगाह आला हजरत के पूर्व सज्जादानशीं और संरक्षक मुफ्ती अख्तर रजा खां उर्फ अजहरी मियां ने शनिवार को जारी बयान में इस मामले पर केन्द्र सरकार के रुख के विरोध का ऐलान किया.

उन्होंने कहा कि तीन तलाक तीन ही मानी जाएंगी. एक साथ तीन बार कही गयी तलाक को एक तलाक ही मानने की केन्द्र की दलील और इससे जुड़ा हलफनामा दायर किया जाना शरीयत में सीधा हस्तक्षेप होगा, जो कुबूल नहीं किया जाएगा.

आपको बता दें कि यह पहली बार है जब दरगाह आला हजरत की तरफ से तीन तलाक के मामले पर बयान जारी किया गया है.

कुरान और हदीस के मुताबिक सैद्धांतिक रूप से दुरुस्त है तीन तलाक

अजहरी मियां ने बयान में कहा कि कुरान और हदीस के मुताबिक तीन तलाक सैद्धांतिक रूप से दुरुस्त है, लेकिन एक सांस में ही तीन बार तलाक बोलने को इस्लाम में कभी अच्छा नहीं माना गया है. इसी धारणा पर शरई अदालत में मुसलमानों के फैसले होते रहे हैं.

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उन्होंने कहा कि लोकसभा में विधेयक लाकर या सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके तीन तलाक को एक तलाक मानना मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप होने के साथ-साथ संविधान में अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों का हनन भी है.

तीन तलाक की आड़ में यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे को भी हवा दे रही है केन्द्र सरकार

दरगाह आला हजरत के प्रवक्ता मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी ने कहा कि केन्द्र सरकार तीन तलाक की आड़ में यूनिफॉर्म सिविल कोड के अपने पुराने मुद्दे को भी हवा दे रही है. ऐसी संहिता इस मुल्क और यहाँ की आवाम के लिए कभी भी फायदेमंद नहीं हो सकती.

बैठक में शामिल उलमा ने आरोप लगाया कि कुछ लोग मुस्लिम औरतों को इस्लाम के खिलाफ बहका रहे हैं. ऐसा करने वाले लोगों का असल मकसद संवेदनशील मामलों पर मुसलमानों में अन्तर्विरोध पैदा करके मुस्लिम पर्सनल लॉ को खत्म करना है. मुस्लिम महिलाओं को इस्लामी शरीयत पर पूरा यकीन करना चाहिये और तलाक जैसे मसलों को शरई अदालतों में ही लाना चाहिये.

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