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‘पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही नहीं’..

“तुम एस्ट्रोनॉट बनकर क्या करोगी. औरतें एस्ट्रोनॉट नहीं बनतीं. तुम हवा में उड़ती फिरोगी तो पति के लिए खाना कौन बनाएगा”
कहने को तो ये लंदन में हुए नाटक ‘बुर्क़ ऑफ़’ की शुरुआती लाइनें हैं लेकिन बहुत से परिवारों की शायद यही हक़ीक़त है. कम से कम नादिया मंज़ूर की ज़िंदगी की असलियत तो यही है..
असल ज़िंदगी पर आधारित इस नाटक में नादिया ने अपनी ज़िंदगी से जुड़े 21 किरदार ख़ुद निभाएँ हैं. नादिया का जन्म ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के परिवार में हुआ जहाँ उन्हें लड़कों से बात करने, मनपसंद कपड़े पहनने, अपने फ़ैसले ख़ुद लेने की आज़ादी नहीं थी. ब्रिटेन में पली बढ़ी नादिया की सोच पश्चिमी शैली में ढली थी जबकि पाकिस्तान से आया परिवार पारंपरिक सोच वाला था जहाँ हर फ़ैसला पुरुष लेता है.
ज़िंदगी की इसी जद्दोजहद को नादिया ने कॉमेडी के ज़रिए नाटक में उतारा है.

जब मिली घर छोड़ने की धमकी

नाटक के बारे में नादिया कहती हैं, “मैं बचपन में समझ नहीं पाती थी कि मैं कौन हूँ. मेरी इंग्लिश सहेलियाँ जब मुझसे बताती थीं कि वो अपनी अम्मी से हर तरह की बातें करती हैं तो मुझे लगता था कि मैं क्यों नहीं कर सकती.”
नादिया का कहना है, “मुझे जो ज़िंदगी चाहिए थी वो मैं झूठ बोल कर परिवार के बाहर जी रही थी क्योंकि मैं अपने फ़ैसले ख़ुद नहीं ले सकती थी. जब पिता को पता चला कि मैं अंग्रेज़ लड़के से शादी करना चाहती हूँ तो उन्होंने कहा कि ऐसे में परिवार से मेरा कोई रिश्ता नहीं बचेगा. मैं ख़ुद से झूठ बोल कर थक गई थी और एक दिन घर से भागकर न्यूयॉर्क चली गई. ज़िंदगी के बारे में लिखना शुरु किया और ये नाटक बन गया.”
डेढ़ घंटे के प्ले में नादिया पाकिस्तानी समाज के साथ-साथ अपने परिवार को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकती, फिर वो उनके पिता और भाई ही क्यों न हो- पिता जो बेटी के खाने तक पर टोकता है कि मोटी हो गई तो शादी कौन करेगा और भाई कट्टरपंथी विचारधारा की ओर जा चुका है.

 

सेक्स पर बहस

नाटक में सेक्स जैसे विषयों पर पाकिस्तानी समाज के रवैये पर भी नादिया ने सवाल उठाए–जहाँ वे चुटकी लेते हुए कहती हैं, “पाकिस्तानी समाज में सेक्स की कोई जगह नहीं है. दरअसल पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही नहीं”. पूरे नाटक में नादिया के निशाने पर सबसे ज़्यादा रहते हैं उनके अब्बू जिनकी बेहद निगेटिव, रूढ़ीवादी छवि पेश की गई है.
नाटक की ख़ासियत है कि आख़िर में नादिया ने स्टेज पर अपने पिता को बुलाया जो दर्शक दीर्घा में बैठकर नाटक देख रहे थे.
नादिया कहती हैं कि जब न्यूयॉर्क में उन्होंने नाटक किया था तो उनके पिता नाटक देखने आए और पिता का नज़रिया पूरी तरह बदल गया. नादिया के पिता ने बताया कि आज वे अपनी बेटी के सबसे बड़े समर्थक हैं.
नादिया की मंशा नाटक को भारत और पाकिस्तान ले जाने की है और नाटक से आगे बढ़कर औरतों के हक़ को बड़ा मुद्दा बनाने की भी.

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