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बजट तय करेगा देश की रेटिंग का भविष्य….

जानकार मानते हैं कि चालू वित्त वर्ष में बेहतर मानसून के बाद अच्छी खेती और वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद विकास दर में वृद्धि की उम्मीद की जा रही थी।
नई दिल्ली। लंबे अरसे से अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों से रेटिंग बढ़ने की उम्मीद कर रही सरकार को अब बजट का इंतजार है। संकेत मिल रहे हैं कि बजट में अगर विकास की दिशा में पर्याप्त कदम उठे तो रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग को संशोधित कर सकती हैं। खासतौर पर राजकोषीय प्रबंधन और आर्थिक सुधारों की दिशा में उठे कदमों पर रेटिंग का भविष्य तय करेगा। यूपीए के कार्यकाल में नीतिगत जड़ता के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत की रेटिंग घटाने का सिलसिला शुरू कर दिया था। उसके बाद से लगातार रेटिंग में वृद्धि का इंतजार बना हुआ है। तीनों प्रमुख रेटिंग एजेंसियों एस एंड पी, मूडीज और फिच में केवल मूडीज की रेटिंग सकारात्मक आउटलुक के साथ है। बाकी दोनों की रेटिंग स्थिर आउटलुक वाली हैं। एस एंड पी और फिच दोनों की रेटिंग स्टेबल आउटलुक के साथ बीबीबी- है। मूडीज की रेटिंग एक स्तर ऊपर पॉजिटिव आउटलुक के साथ बीएए है।
जानकार मानते हैं कि चालू वित्त वर्ष में बेहतर मानसून के बाद अच्छी खेती और वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद विकास दर में वृद्धि की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन नोटबंदी के बाद बाजार में मांग कम होने के चलते अर्थव्यवस्था उम्मीद के अनुरूप रफ्तार नहीं पकड़ पायी। मांग कम होने से कंपनियों की आमदनी पर भी असर पड़ा है जो कारपोरेट टैक्स के राजस्व को भी प्रभावित कर सकती है। रेटिंग एजेंसियों से जुड़े अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार का राजकोषीय घाटे में कमी के तय मार्ग को लेकर अगर सरकार फेरबदल करती है तो वह रेटिंग पर विचार करने के दौरान भारत के खिलाफ जा सकता है। चूंकि सरकार पर बजट पेश करते वक्त न केवल पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों का दबाव है बल्कि नोटबंदी के असर को कम करने की भी जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसे में वित्त मंत्री के लिए बजट में राजकोषीय प्रबंधन के तय मार्ग पर आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि वित्त मंत्रालय के अधिकारी मानते हैं कि आर्थिक सुधारों के रास्ते पर आगे बढ़कर सरकार रेटिंग में सुधार का रास्ता साफ कर सकती है। वैसे भी चालू वित्त वर्ष में आर्थिक विकास की दर के लक्ष्य से काफी नीचे रहने की आशंका ही जतायी जा रही है। कई एजेंसियां तो इसके सात फीसद से भी नीचे रहने का अनुमान लगा रही हैं। इसलिए सारा फोकस अब अगले वित्त वर्ष की विकास दर पर होगा।

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