राहुल के वायनाड से चुनाव लड़ने के मायने!

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने केरल की वायनाड लोकसभा सीट से पर्चा दाखिल कर दिया है। राहुल के साथ नामांकन दाखिल करते समय उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी मौजूद रहीं। राहुल अपनी परंपरागत सीट अमेठी से भी लोकसभा चुनाव लड़ रहे है। राहुल गांधी का अमेठी के साथ-साथ वायनाड सीट से भी लोकसभा चुनाव लड़ना उत्तर से लेकर दक्षिण तक चुनावी मुहिम को साधने की कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सक्रिय राजनीति में प्रवेश के बाद से वे अब तक तीन लोकसभा चुनाव अमेठी सीट से ही लड़े है और कभी भी इतने कम अंतर से तो नहीं जीते कि उन्हे दो सीटों से लोकसभा का चुनाव लड़ना पड़े।
हालांकि अमेठी लोकसभा सीट पर वे पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी को मात्र 1 लाख वोटों से पराजित कर पाए थे। परंतु यह अंतर इतना कम भी नहीं था कि वे इसमें अपने क्षेत्र के मतदाताओं का उनसे मोहभंग होना तक देखें। फिर वे इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं और जनता के बीच भी उनकी स्वीकार्यता में निःसंदेह बढ़ोत्तरी हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार तथा बीजेपी की रीति नीति पर वह आज कल जो प्रहार करते हैं, उसे एकदम खारिज करने की स्थिति में न तो मोदी सरकार दिखाई देती है और न ही भारतीय जनता पार्टी उसे मजाक का मुद्दा बना पा रही है। निःसंदेह कई मौकों पर देश की राजनीति में उनके बढ़ते प्रभाव के कुछ सबूत भी मिल चुके है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी द्वारा अमेठी की पारंपरिक सीट के अलावा केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़ने का फैसला आश्चर्यजनक प्रतीत होता है।
जब भी कोई राजनेता दो
सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला करता है तो सामान्य तौर पर यही धारणा बनाई जाती है कि उसे अपनी परंपरागत सीट से जीत का भरोसा नहीं है। राहुल गांधी इस बार दो सीटों से लोकसभा चुनाव लड़  रहे हैं तो उनके बारे में भी कुछ ऐसी ही धारणा बन रही है तथा कांग्रेस पार्टी इसे कैसे नकार सकती है।
पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी से अमेठी लोकसभा क्षेत्र से 1 लाख वोटों के अंतर से चुनाव हारने वाली स्मृति ईरानी अगर बीजेपी की केन्द्रीय
चुनाव समिति से उनकी लोकसभा सीट बदलने का अनुरोध करतीं तो यह माना जा सकता था कि वह इस बार भी पराजय की आशका को भांप चुकी हैं ,लेकिन राहुल गांधी अगर अपनी परंपरागत सीट के अलावा किसी और सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं तो निःसंदेह इसे अमेठी में आसन्न पराजय की आशंका का परिचायक ही माना जाएगा। इसके विपरीत अमेठी में राहुल गांधी को चुनौती देने के लिये स्मृति
ईरानी का उत्साह और मनोबल देखते ही बन रहा है। परिणाम चाहे जो भी हों परंतु स्मृति ईरानी का उत्साह और मनोबल राहुल गांधी की अपेक्षा दुगुना
दिखाई दे रहा है और इसका एक संदेश यह भी है कि वे नामुमकिन को मुमकिन बनाने के लिये कटिबद्ध है।
इधर अमेठी के अलावा वायनाड से भी चुनाव लड़ने के राहुल गांधी के फैसले पर तंज कसते हुए केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि राहुल गांधी अमेठी में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे ,इसलिये उन्होंने  वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ने का फैसला किया। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी का वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ने का
फैसला दक्षिणी राज्यों को यह संदेश देना है कि कांग्रेस उनकी संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करती है। राहुल गांधी उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के
बीच सेतु की भूमिका निभाएंगे। वैसे राहुल गांधी की वायनाड सीट से उम्मीदवारी के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी
दक्षिणी राज्यों में उनकी स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। परंतु अगर ऐसा ही है तो राहुल गांधी कर्नाटक की सुरक्षित और सुविधाजनक लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ने का निर्णय कर सकते थे जहां कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर गठबंधन के हाथों में सत्ता की बागडोर है।
 गौरतलब है कि अतीत
में एक बार यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने भी कर्नाटक की बेल्लारी सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। तब उनके खिलाफ भाजपा प्रत्याशी सुुषमा स्वराज चुनाव मैदान में थीं। वैसे राहुल गांधी इस लोकसभा चुनाव में किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ना ही चाहते थे तो वे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ या
राजस्थान की किसी सीट से भी चुनावी भाग्य आजमा सकते थे । इतिहास बताता है कि कांग्रेस का हमेशा से ही दक्षिणी राज्यों से रिश्ता रहा है। 1977 के लोकसभा चुनावों में रायबरेली से पराजय के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने कर्नाटक की चिकमंगलूर क्षेत्र से उप चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। उसके बाद उन्होंने 1980 के मध्यावधि चुनाव में परंपरागत रायबरेली सीट के अलावा आंध्रप्रदेश की मेडक सीट से भी कांग्रेस  के टिकट पर चुनाव लड़ा था और दोनों ही क्षेत्रों से अच्छे मतों से जीत हासिल की थी। अब राहुल गांधी वायनाड सीट से चुनाव लड़  रहे हैं तो निष्चित तौर पर उन्होंने वहां अपनी जीत का अनुमान लगा लिया होगा ।
 वायनाड में राहुल गांधी को जिताने के लिए गांधी परिवार के विश्वासपात्र नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री एके एंटनी चुनाव अभियान की बागडोर संभालेंगे । एंटनी ने इसके लिये मैदानी जमावट पहले से ही प्रारंभ कर दी थी, क्योंकि वायनाड सीट से राहुल गांधी के
चुनाव लड़ने का निर्णय कांग्रेस पार्टी में आंतरिक तौर पर पहले ही कर लिया गया था।
 देश के संसदीय इतिहास में राजनेता दो ही नहीं बल्कि चार -चार लोकसभा
क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का कीर्तिमान भी बना चुके हैं और राहुल गांधी ने अगर दो सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया है तो यह उनका लोकतांत्रिक और
संवैधानिक अधिकार है, जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती। खैर केरल में इस समय वाम मोर्चे की सरकार है और  सरकार के मुखिया पी
विजयन ने राहुल गांधी के निर्णय को गलत बताते हुए कहा है कि राहुल की लड़ाई बीजेपी से है, लेकिन यहां वे वामदलों के खिलाफ लड़ने आ रहे है। आश्चर्यजनक बात यह है कि राहुल गांधी अपने राजनीतिक हितों के लिये  उस वाम मोर्चा से भी टकराव  के लिये तैयार हो गए जिसने 2004  के लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस नीति यूपीए को अपना समर्थन प्रदान किया था। अब यहां सवाल यह भी उठता है कि अगर आगे कांग्रेस को सत्ता में आने के लिये वाम मोर्चा के
समर्थन की आवश्यकता पड़ी तो क्या वाम मोर्चा इसके लिये तैयार होगा।
वायनाड को ही अमेठी के बाद पहली पसंद मानने वाले राहुल गांधी का यह निर्णय कौतूहल का मुद्दा बना है। कांग्रेस पिछले दो लोकसभा चुनावों में यहां से जीत हासिल कर चुकी है। ऐसे में राहुल गांधी यहां अपनी जीत सुनिश्चित मानकर चल रहे है। वायनाड लोकसभा सीट में वायनाड, कोजीकोट और मलमपुरम क्षेत्र की 7 विधानसभा सीटें आती हैं और यहां महिला मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत
अधिक है। यहां महिला मतदाताओं की संख्या 6 लाख 70 हजार है। काली मिर्च और
काफी का उत्पादन यहां प्रचुरता में होता है। इस लोकसभा क्षेत्र में लगभग आधे मुस्लिम  मतदाता हैं और मुस्लिम लीग का यहां अच्छा खासा प्रभाव है। ऐसे में  जाहिर तौर पर मुस्लिम लीग का समर्थन भी कांग्रेस को लेना ही होगा।  खैर राहुल
गांधी ने अमेठी के बाद वायनाड सीट को अपनी पसंद बताकर चुनाव लड़ने को लेकर जो भी गणित बिठाया अब इसका परिणाम तो 23 मई के बाद ही पता चलेगा।

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