रूस के हथियार गुब्बारों जैसे, नहीं पकड़ सकता रडार,5 मिनट में तैयार हो जाता है टैंक

माॅस्को. रूस ने दुश्मनों को धोखा देने के लिए गुब्बारेनुमा हथियारों की तैनाती शुरू कर दी है। इन फेक हथियारों और साजो-सामान में जेट, मिसाइल, टैंक, मिलिट्री ट्रक से लेकर एयरक्राफ्ट तक शामिल हैं। ये इतने कारगर हैं कि कई बार यूएस और नाटो के सर्विलांस सिस्टम या रडार भी पता नहीं लगा पाते कि ये असली हैं या नकली। गुब्बारे की तरह फूलने वाला टैंक पांच मिनट में तैयार हो जाता है और असली टैंक नजर आता है। बता दें कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के वक्त इसी तरह के फेक हथियारों का इस्तेमाल यूएस और उसके सहयोगी देशों ने किया था। रूस में इस तरीके को मास्किर्वोका कहा जाता है…
– ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की खबर के मुताबिक, रूस में इस तरीके को ‘मास्किर्वोका’ कहा जाता है। इसका मतलब होता है मास्किंग, यानी बनावटी। यह जंग की एक साइकोलॉजिकल स्ट्रैटजी है, जिसे रूस इस्तेमाल कर रहा है। कई बार इसका इस्तेमाल दूसरे देशों की आर्मी को सरप्राइज करने और धोखा देने के लिए भी किया जाता है।
– बता दें कि रूस की आर्मी के लिए ये हथियार रसबल कंपनी बना रही है। इस कंपनी को हॉट बैलून बनाने में महारत हासिल है।
– रसबल के पास गुब्बारानुमा वेपन्स सिस्टम की बड़ी रेंज है।
– इसके पास फेक MiG-31, Su-27 जैसे फाइटर प्लेन और T-72 और T-80 जैसे टैंक हैं।
– S-300 सरफेस टु एयर मिसाइल बैटरी का कम्प्लीट वर्जन भी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इसे पिछले हफ्ते सीरिया भी भेजा गया था।
– इसके अलावा यह कंपनी गुब्बारानुमा टेंट, रडार स्टेशन और शाॅर्ट-रेंज टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल भी बेचती है, जिन्हें आसानी से कमांड और कंट्रोल किया जा सकता है।
पांच मिनट में तैयार हो जाता है टी-80 टैंक
– इन्फ्लेटेबल टी-80 टैंक की लागत 16000 अमेरिकी डॉलर यानी 10.70 लाख रुपए है। इसकी खासियत यह है कि यह पांच मिनट में तैयार और पैक हो जाता है।
– इसका मतलब है कि 31 फर्जी टैंक की पूरी बटालियन को खड़ा करने में करीब ढाई घंटे ही लगेंगे। लागत 4,96,000 डॉलर यानी 3.30 करोड़ अाएगी।
सेकंड वर्ल्ड वॉर में हुआ था इस इन्फ्लेटेबल टेक्नीक का इस्तेमाल
– इन्फ्लेटेबल वेपनरी टेक्नीक को सेकंड वर्ल्ड वॉर में इस्तेमाल किया गया था। 1944 में यूरोप के मित्र देशों के हमले के पहले जनरल एस. पाटोन को फर्स्ट यूएस आर्मी ग्रुप का इंचार्ज बनाया गया था। उस वक्त पाटोन ने शहरों में लकड़ी, फैब्रिक या इन्फ्लेटेबल रबड़ के व्हीकल्स तैनात किए गए थे।
– ऐसा कहा जाता है कि 14वीं सदी से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।
रूस ने क्रीमिया में इस्तेमाल की थी मास्किर्वोका टेक्नीक
– रूस ने 2014 में क्रीमिया में इस टेक्नीक का इस्तेमाल किया था। आर्मी ने सरकारी बिल्डिंग्स पर मास्क पहनें ‘लिटिल ग्रीन मैन’ को तैनात किया था। ये अपने साथ भारी हथियार लिए हुए थे।
– इसके बाद, 2015 में सीरिया और यूक्रेन में जवानों को वॉलंटियर्स बनाकर भेजा और लोगों को विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाकों से निकाला।

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