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बसपा की मान्यता हो सकती है रद्द, सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल!

बसपा सुप्रीमो मायावती की घोषणा को कानून और सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ बताते हुए बसपा के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल हुई है।

 

 

नई दिल्ली. जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगने को चुनाव का भ्रष्ट तरीका माने जाने के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के दूसरे दिन ही प्रेस कान्फ्रेंस करके धर्म और जाति के आधार पर टिकट देने की बसपा की घोषणा उसे भारी पड़ सकती है। बसपा सुप्रीमो मायावती की घोषणा को कानून और सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ बताते हुए बसपा के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल हुई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट और चुनाव आयोग द्वारा शिकायत पर कोई कार्रवाई न होने से निराश नीरज शंकर सक्सेना ने अपने वकील विष्णु शंकर जैन के जरिये सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल की है। नीरज लखनऊ के रहने वाले हैं और भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य हैं। याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के गत 13 जनवरी के आदेश को चुनौती देते हुए कहा गया है कि हाईकोर्ट उनकी मांगो पर ध्यान दिये बगैर यह कह कर याचिका निपटा दी कि चुनाव आयोग शिकायत पर विचार करे। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के लिए कोई समयसीमा भी तय नहीं की और न ही चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई की। आरोप लगाया गया है कि बसपा द्वारा धर्म के आधार पर वोट की अपील करने से उत्तर प्रदेश का पूरा विधानसभा चुनाव प्रभावित होता है। याचिकाकर्ता ने बसपा की प्रेस कान्फ्रेंस की वीडियो रिकाडिंग भी दाखिल की है जिसमे धर्म के आधार पर वोट की अपील की गई है। याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए में बसपा के खिलाफ कार्रवाई करे। क्योंकि पार्टी ने पंजीकरण के समय इस धारा के तहत की गई धर्मनिरपेक्षता की घोषणा का उल्लंघन किया है। साथ ही बसपा की मान्यता रद की जाए। बसपा द्वारा घोषित उम्मीदवारों को बसपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने से रोका जाए। कहा गया है कि धर्म जाति पर वोट मांगने की मनाही के सुप्रीमकोर्ट के आदेश को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए दिशानिर्देश जारी किये जाएं। याचिका में कहा गया है कि मायावती ने 3 जनवरी को प्रेस कान्फ्रेंस की थी जिसमें सुप्रीमकोर्ट के 2 जनवरी के फैसले का पूरी तरह उल्लंघन हुआ। आरोप लगाया गया है कि उस प्रेस कान्फ्रेंस में मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी ने निम्न क्रम में टिकट बांटे हैं।

97 मुस्लिम उम्मीदवार, 87 अनुसूचित जाति उम्मीदवार, 106 पिछड़ा वर्ग और 113 सामान्य वर्ग जिसमें से 66 ब्राम्हण, 36 क्षत्रियों और 11 अन्य उम्मीदवारों को दिये गये हैं। कहा गया है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बावजूद मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी ने 97 टिकट मुसलमान उम्मीदवारों को दिये। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय को समाजवादी पार्टी के झगड़े में नहीं फंसना चाहिए। मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट देकर अपना मत बरबाद न करें। याचिकाकर्ता का कहना है कि बसपा ने गत 26 अक्टूबर को एक बुकलेट जारी की है जिसमें कहा गया है कि मुस्लिम समाज के सच्ची हितैषी बहुजन समाज पार्टी है। ये सारी बातें जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) के तहत चुनाव का भ्रष्ट तरीका मानी जाती हैं। याचिका में चुनाव आयोग को बसपा के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश मांगा गया है।

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