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स्कूल बंक मारने में गुरुजी बच्चों से आगे, जमीं पर हैं उत्तराखंड के तारे..

स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) में उत्‍तराखंड के सरकारी स्‍कूलों की तस्‍वीर सामने आई है। सरकारी स्कूलों में नामांकन तो बढ़ा है, पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हो रहा।

 

 

देहरादून: जब अधिकतर लोग राजनीतिक बहस में मशरूफ हैं, राज्य में शिक्षा की चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। सरकारी स्कूलों में नामांकन तो बढ़ा है, लेकिन करोड़ों खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूलों और शिक्षा की गुणवत्ता में रत्तीभर सुधार नहीं हो रहा। उल्टा हर साल स्थिति ज्यादा चिंताजनक हो रही है। शिक्षा व्यवस्था की यह स्याह तस्वीर सामने आई है प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) में। इस रिपोर्ट को आधार माना जाए तो उत्तराखंड में गुणवत्तापरक शिक्षा अभी भी दूर की कौड़ी दिखाई पड़ रही है।

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन पिछले करीब डेढ़ दशक से प्रत्येक वर्ष भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में निजी व सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर रिपोर्ट प्रकाशित करता है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होने वाली इस रिपोर्ट में राज्यवार बच्चों के लर्निंग लेवल, आरटीई के मानक, उपलब्ध संसाधन आदि पर किए गए सर्वे शामिल किए जाते हैं। वर्ष 2016 में उत्तराखंड राज्य में 388 गांवों का सर्वे हुआ, जिनमें 7528 घरों व तीन से 16 आयु वर्ग के 11255 बच्चों को शामिल किया गया। इस रिपोर्ट को गुणवत्ता के आईने में देखें तो राज्य में अभी भी बड़े सुधार की जरूरत है। यहां करीब 40 फीसद छात्रों की शैक्षिक गुणवत्ता औसत से कम है। अभी भी छात्रों की एक बड़ी संख्या हिंदी व अंग्रेजी पढ़ने-लिखने और गणित के सवाल हल करने में पिछड़ी है। राहत की बात यह है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद नामांकन बढ़ा है। यह अलग बात है कि आरटीई के अनुरूप अभी भी सुविधाओं का अभाव दिखता है।

शब्द दूर, आखर की भी नहीं पहचान

प्रथम संस्था ने राज्यभर में शिक्षा के स्तर का जायजा लिया तो पता चला कि कक्षा एक से आठ तक के सैकड़ों बच्चों को शब्द तो दूर अक्षरों की भी पहचान नहीं है। उदाहरण के लिए कक्षा तीन में 6.2 प्रतिशत बच्चे अक्षर भी नहीं पड़ सकते। 17.5 फीसद बच्चे अक्षर पढ़ सकते हैं पर शब्द नहीं। हद ये कि विगत वर्षों में इस स्थिति में सुधार की बजाय लगातार गिरावट दर्ज की गई है।

गुणा-भाग में पिछड़े नौनिहाल

रिपोर्ट को आधार माना जाए तो कक्षा एक के 26.6 विद्यार्थी नौ तक अंक भी नहीं पहचान सकते। अन्य कक्षाओं में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कक्षा तीन में भी 5.7 बच्चे 9 तक अंक नहीं पहचान पाए। भाग व घटाव में भी बच्चे फिसड्डी नजर आए।

अंग्रेजी में भी फिसड्डी

अंग्रेजी पढ़ने और समझने में भी ग्रामीण क्षेत्र के निजी व सरकारी स्कूलों की तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है। संस्था ने अंग्रेजी के छोटे व बड़े अक्षर, सरल शब्द व वाक्यों को आधार बना बच्चों के ज्ञान की परख की। शुरुआती कक्षाओं को छोड़ भी दें तो कक्षा आठ में भी 53.5 फीसद ही बच्चे अंग्रेजी के सरल वाक्य पढ़ सकते हैं।

गुरुजी की उपस्थिति बच्चों से कम

प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बंक मारने में गुरुजी बच्चों से आगे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों के अध्ययन में तो यही खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट में बच्चों की उपस्थिति (सर्वे के दिन) जहां 82.5 मिली तो बच्चों के मुकाबले 79.7 प्रतिशत ही शिक्षक स्कूल में मौजूद मिले। यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि विगत वर्षों में यह ग्राफ कम हुआ है। वर्ष 2010 की रिपोर्ट पर गौर करें तो यह आंकड़ा तब 90.9 प्रतिशत था। जबकि 2012 में यह 86.9 व 2014 में 81 फीसद रहा था। इसे शिक्षकों की कमी या संसाधनों का अभाव ही कहेंगे कि मिश्रित कक्षाओं का प्रतिशत बीते सालों में बढ़ गया है। मिश्रित माने वह कक्षाएं जहां कई क्लास के छात्र एक साथ बैठकर पढ़ रहे हैं।

पढ़ने का स्तर (प्रतिशत)

कक्षा-अक्षर भी नहीं-अक्षर-शब्द

एक-31.8-38.1-15.4

दो-11-29.7-20.2

तीन-6.2-17.5-16

चार -5.2-11.6-12.2

पांच-4.7-6.2-9.8

छह-2.2-5.3-7.5

सात-3.8-5.9-5.4

आठ -1.0-2.6-4

गणित का ज्ञान (प्रतिशत)

कक्षा-9 तक के अंक की पहचान नहीं-घटाव-भाग

एक-26.6-5.2-1.4

दो- 9.2-17.7-3.1

तीन- 5.7-25.6-11

चार-4.8-26.9-22.5

पांच-2.2-23.6-37

छह- 2.5-28.9-33.1

सात-2.8-23.7-39.3

आठ-0.9-23.5-46

अंग्रेजी ज्ञान (प्रतिशत में)

कक्षा-बड़े अक्षर-छोटे अक्षर-सरल शब्द-सरल वाक्य

एक-34.5-20.8-24-14.5-6.3

दो-15.9-19.6-31.2-18.6-14.7

तीन-10.5-16.1-27.4-24.2-21.9

चार-9.2-12.3-27.3-21.7-29.5

पांच-5.8-9.9-20.8-25.2-38.3

छह-3.9-5.9-22.5-28.4-39.3

सात-5-5.4-19.8-24.1-45.7

आठ-2.1-5.1-16.6-22.7-53.5

बच्चों-शिक्षकों की उपस्थिति

2010 2012 2014 2016

छात्र 89.7 81.9 80.2 82.5

शिक्षक 90.9 86.9 81 79.7

 

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