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चीन और अमेरिका के बीच कोल्ड वार, दोनों देशों ने एक दुसरे से आयात होने वाले समनो पर लगाये भरी टैरीफ़

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चीन के वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने शुल्क के प्रभावी होने के चंद मिनटों बाद जारी बयान में कहा, “चीन ने पहला वॉर नहीं करने का वादा किया था, लेकिन देश और यहां के लोगों के हित के लिए हम इसका मुंहतोड़ जवाब देंगे।”
चीन ने डॉलर का बदला डॉलर से लेने का इरादा जाहिर करते हुए अमेरिकी निर्यात पर ‘‘ तत्काल ’’ शुल्क लगा दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस टकराव से वैश्विक अर्थव्यवस्था में खलबली पैदा हो जाएगी और विश्व व्यापार प्रणाली पर इसका काफी नकारात्मक असर पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन ने चीन के औद्योगिक मशीनकरी, मेडिकल उपकरण और ऑटो पार्ट्स जैसे चीनी उत्पादों पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाया है।

चीन द्वारा टैरिफ बढ़ाए जाने से अमेरिका से आने वाले एसयूवी, मीट और सी फूड महंगे हो जाएंगे। अमेरिका ने आने वाले दिनों में और अधिक टैरिफ लगाने की घोषणा कर रखी है।

आईकॉनिक कंपनी भी होंगे प्रभावित 

सिडनी मॉर्निग हेराल्ड के अनुसार आईकॉनिक अमेरिकन कंपनी हार्ले डेविडसन का उत्पाद प्रभावित होगा। कंपनी का कहना है कि वह अपनी मैनुफैक्चरिंग यूनिट अमेरिका से हटाने पर विचार कर रहा है, ताकि ईयू के देश उन पर (रिटेलियरी) टैरिफ न लगा सकें। अमेरिकी कंपनी एप्पल, वॉलमार्ट और जनरल मोटर्स चीन से ऑपरेट करती हैं। इन पर भी असर पड़ेगा।

अमेरिका बोला- चीन पर दबाव बनाने के लिए यह कदम जरूरी था

चीन के विनिर्माता पहले ही युआन में मजबूती से जूझ रहे हैं, क्योंकि इससे निर्यात और महंगा हो गया है। सीएनएन के मुताबिक, ट्रंप और उनके सलाहकारों का कहना है कि चीन की अनुचित गतिविधियों को देखकर यह शुल्क चीन पर दबाव बनाने के लिए जरूरी था। व्हाइट हाउस ने शुल्क लगाने के अलावा निवेश और चीनी नागरिकों को वीजा देने पर भी अडंगा लगा रहा है।
 
उद्योग जगत में असहजता के नए संकेत उस वक्त देखने को मिले, जब एक व्यापार सर्वेक्षण में दिखाया गया कि अमेरिका के सेवा क्षेत्र में पहले से ही आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी दिक्कतें पेश आ रही हैं और व्यापार बंदिशें बढ़ने की आशंका से लागत में इजाफा दर्ज किया जा रहा है। आपूर्ति प्रबंधन संस्थान की सेवा उद्योग सर्वेक्षण समिति के प्रमुख एंथनी नाइव्स ने पत्रकारों को बताया, ‘‘ हमने मुद्रास्फीति के संकेत देखने शुरू कर दिए हैं।’’

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व्हाइट हाउस के व्यापार अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मौजूदा मजबूती का मतलब है कि यदि यह युद्ध ज्यादा बढ़ता है, तो ऐसी स्थिति में अमेरिका अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में ज्यादा दर्द सह पाने में सक्षम है। सीएनएन के मुताबिक अमेरिका चाहता है कि चीन ‘मेड इन चाइना 2025’ की नीति के तहत बनाए जा रहे सामानों पर सब्सिडी कम करे। इसके तहत रोबोटिक्स, इलेक्ट्रिक कार और कंप्यूटर चिप्स बनाए जा रहे हैं। इससे अमेरिकी उद्योगों के प्रभावित होने का खतरा है।
चीन इसके लिए राजी नहीं है। वह विश्व व्यापार में अग्रणी बनना चाहता है। लिहाजा, वह सब्सिडी कम करने को तैयार नहीं है। दोनों पक्षों में यह होड़ लगी है कि कौन कितना ‘दर्द’ सह सकता है। कौन कितना विषम परिस्थितियों को झेल सकता है, इसकी लड़ाई शुरू हो गई है।
 
अमेरिकी विशेषज्ञों का एक धड़ा मानता है कि टैरिफ लगाना अमेरिका के हित में है। इससे अमेरिका की छवि निखरेगी। अमेरिका की विश्वसनीयता बढ़ेगी। ट्रंप ने अपने सहयोगी कनाडा और यूरोपियन यूनियन से आयात होने वाले सामानों पर भी आयात लगा दिए है। भारत के आयात होने वाले सामान पर भी टैरिफ लगाया गया है। भारत ने भी जैसे को तैसा कर उतनी ही वैल्यू का टैरिफ अमेरिकी सामानों पर लगा दिया है।

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