गंगा

रिपोर्ट में कर दिया चंगा, निर्मल हो गई गंगा, किया दावा- अब नदी बिलकुल साफ

लखनऊ। तो क्या गंगा प्रदूषण मुक्त हो गईं? हैरानी की ही बात है कि जो काम बीते तीन दशकों में गंगा एक्शन प्लान से लेकर नमामि गंगे व राष्ट्रीय गंगा नदी संरक्षण मिशन अरबों रुपये खर्च करके भी नहीं कर सका, आंकड़ों की बाजीगरी से वह कमाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तर प्रदेश जल निगम व सीवेज संयंत्रों का संचालन करने वाले शहरी निकायों ने कर दिखाया।

कुंभ के मद्देनजर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गढ़मुक्तेश्वर से वाराणसी तक सात स्थानों पर गंगा की जल गुणवत्ता का बुलेटिन रोजाना जारी किया जा रहा है। विभिन्न अनुश्रवण स्थलों की रियल टाइम मॉनीटरिंग रिपोर्ट भी जारी की गई है। इसके मुताबिक गंगा अब बिलकुल साफ हो गई है।

बोर्ड द्वारा प्रतिदिन जारी बुलेटिन में केवल तीन पैरामीटर्स रंग, पीएच, घुलित ऑक्सीजन के आंकड़े दिए जा रहे हैं, जिनके मुताबिक गंगा का पानी आचमन के लायक है। हालांकि बीओडी और फीकल कॉलीफॉर्म से जुड़े आंकड़े इस बुलेटिन से नदारद हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी सीवेज शोधन संयंत्रों (एसटीपी) की परफॉमेर्ंस से जुड़ी अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट में अधिकतर बड़े शोधन संयंत्रों सहित लगभग 55 फीसद मानकों के अनुसार काम नहीं कर रहे थे। बीती छह जनवरी को जारी बुलेटिन में प्रदेश में संचालित कुल 72 संयंत्रों में से 66 का निरीक्षण किया गया था, जो मानकों के अनुसार चल रहे हैं। वहीं 11 संयंत्र मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। वहीं सात संयुत्कउत्प्रवाह शोधन संयंत्रों (सीइटीपी) में चार मानकों के अनुसार मुताबिक चल रहे हैं तथा दो मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं। एक का संचालन बंद है। इसके बाद नौ जनवरी की बुलेटिन के अनुसार 43 संयंत्रों का निरीक्षण किया गया। यह सभी मानकों को पूरा करते पाए गए ,जबकि 10 जनवरी की बुलेटिन में 55 संयंत्रों का निरीक्षण किया गया और सभी मानकों के अनुसार चलते पाए गए। हालांकि यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि इन 72 एसटीपी की कुल शोधन क्षमता के मुकाबले कितने सीवेज का मानकों के मुताबिक उपचार हो पा रहा है।

गंगा नदी जल गुणवत्ता की रियल टाइम मॉनिटरिंग में यह भी देखने में आया है कि अधिकतर स्थलों पर कई पैरामीटर्स का स्तर सामान्य दर्ज हुआ है जो बड़ा सवाल है। रिपोटोर्ं में बीओडी तीन मिलीग्राम प्रति लीटर, सीओडी नौ मिलीग्राम प्रति लीटर, टोटल सस्पेंडेड सॉलिड नौ मिलीग्राम प्रति लीटर तथा पीएच 7.1 के स्तर में रिकॉर्ड हुआ है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अधिकारी का दावा है कि चमड़ा इकाई, पेपर मिल, डिस्टिलरी सहित सभी ऐसे उद्योग जिनका उत्प्रवाह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गंगा में निस्तारित होता था, रोक दिया गया है। यही वजह है कि प्रदूषण कंट्रोल हो गया है।

यह अचानक कैसे हो गया?

गंगा पर स्थापित जल गुणवत्ता अनुश्रवण स्थलों से जुड़ी रियल टाइम मॉनिटरिंग में उन सभी स्थानों यथा कानपुर, बिठूर, कन्नौज, बदायूं, वाराणसी पर बीओडी, सीओडी व टोटल सस्पेंडेड सॉलिड को मानक सीमा के भीतर दर्ज किया गया है, जहां बोर्ड की नवंबर व दिसंबर 2018 की नवीनतम मॉनिटरिंग रिपोर्ट में नदी जल गुणवत्ता को असंतोषजनक बताया गया है। इनमें से अधिकतर स्थानों पर बीओडी व फीकल कॉलीफॉर्म (मलजनित जीवाणु) की संख्या मानकों से अधिक पाई गई है।
जलनिगम के एमडी एके श्रीवास्तव ने कहा कि एसटीपी तो मानकों पर चल ही रहे थे। नालों पर बायोरेमिडिएशन तकनीक की मदद से प्रदूषण रोका जा रहा है। सामान्यत: यही किया जाता है। यह खर्चीला है। पर इसमें कोई कलाकारी नहीं की गई है।

प्रो.यूके चौधरी, नदी विशेषज्ञ, महामना मालवीय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फॉर गंगा मैनेजमेंट ने कहा कि विभाग झूठ बोल रहे हैं। गंगा की ऑक्सीजन वहन करने की क्षमता 12-14 पीपीएम है। कहीं पर भी ऑक्सीजन का स्तर इतना है। बीओडी का स्तर कहीं भी एक से दो मिग्रा. के बीच मिला है। फिर क्या कर डाला कि गंगा में प्रदूषण कम हो गया। केवल लोगों को गुमराह किया जा रहा है। यदि इसी तरह गंगा प्रदूषण मुक्त हो सकती तो अभी तक किया क्यों नहीं?

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