द्वापर काल से मौजूद है लखनऊ के बटुक भैरो का मंदिर जाने इतिहास

 

लखनऊ के कैसरबाग़ स्थित बटुक भैरों का मंदिर लगभग 5000 हजार वर्ष पुराना है। ऐसा माना जाता है की यह भैरों मंदिर द्वापर युग का है। कहा जाता है बटुक बैरों यहाँ बालरूप में विराजमान है। बटुक भैरों सुरों के राजा है इसलिए यहाँ की मन्नतें कला संगीत और साधना से जुडी होती है।
कत्थक घरानो के धुरंधरों ने यहीं पे पैरों में घुंघरू बांध कर कत्थक शिक्षा का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। भादों की आखिरी रात को घुंघरू वाली रात कहा जाता है। भादों की आखिरी रविवार से बटुक भैरों बाबा के आशीर्वाद से साधना प्रारम्भ की जाती है।
मंदिर में बाल रूप में विराजमान भैरों बाबा को सोमरस प्रिय है। इसलिए भरों बाबा को भक्तजन एक से बढ़कर एक अंग्रेजी शराब चढ़कर प्रसन्न करते है। भादों के आखिरी रविवार को यहाँ पर मेला की परंपरा है। यहाँ का मेला दूसरे  मेलों की अपेक्षा बहुत ही अलग होता है। भैरों बाबा को प्रसाद के रूप में मदिरा का भोग लगता है और यही मिली-जुली मदिरा का  वितरण भक्तों होता है। आस्था है की दोष दुःख एवं अन्य समस्याओं का हल प्रसाद की प्राप्ति से हो जाता है।
यह कहा जाता है बलरामपुर इस्टेट के महाराज ने इस मंदिर की  मरम्त करवाई थी।बटुक भैरों को लक्ष्मणपुर का रच्छपाल भी कहा जाता है। दोष, दुःखो और दुष्टों के दमन के लिए बटुक भैरों की उपासना की जाती है।

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