राम मन्दिर

राम मन्दिर की राह में रोड़े आख़िर कब तक…?

राम मन्दिर की राह में रोड़े आख़िर कब तक…?
कृष्णमोहन झा की कलम से …
इस समय देश के पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया चल रही है। अगले साल मई तक लोकसभा चुनाव भी कराए जाएंगे। इसी समय अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा भी गरमा उठा है। केंद्र की मोदी सरकार के पिछले साढ़े चार साल के कार्यकाल के दौरान वैसे तो यह मुद्दा कई बार उछला है, परन्तु 25 नवम्बर को अयोध्या में साधु संतों के भारी जमावड़े के बीच जितने जोर शोर से यह मुद्दा उठाया गया उससे यही सन्देश मिला है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में जितना विलम्ब होना था ,वह हो चुका है। अब और विलम्ब बर्दास्त नहीं किया जाएगा। अयोध्या में साधु संतों की और से जहां यह कहा गया है कि अब धैर्य खोने समय आ चुका है ,वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर यह भरोसा भी व्यक्त किया गया है कि वे मंदिर निर्माण को लेकर गंभीर है ,इसलिए कोई न कोई रास्ता खोज ही लिया जाएगा।  
अयोध्या में आयोजित इस विराट धर्मसभा में 127 सम्प्रदायों के साधु संतो एवं अखाड़ों के महामण्डलेश्वरों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस सभा में लगभग दो लाख श्रद्धालुओं के जुटने का दावा किया गया था। यद्यपि अनुमान के मुताबिक भीड़ तो नहीं जुट सकी ,लेकिन सभा की अगुवाई कर रहे साधु संतों के तेवर इतने उग्र थे कि इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मंदिर निर्माण में अब और विलंब स्वीकार नहीं किया जाएगा। धर्मसभा में चित्रकूट से पधारे तुलसी पीठाधीश्वर स्वामी राम भद्राचार्य ने यह दावा किया है कि पांच राज्यों में लागु आचार सहिता की समाप्ति के बाद मामले में कोई रास्ता निकाल लिया जाएगा। गौरतलब है कि पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव परिणाम 11 दिसंबर को घोषित किए जाएंगे और संयोगवश इसी दौरान संसद का शीतकालीन सत्र भी प्रारंभ होने जा रहा है। इसके पूर्व साधु संत 9 दिसंबर को दिल्ली में एकत्र होकर सरकार पर दबाव बनाएंगे। इस धर्म सभा में मौजूद राम भक्तो को यह शपथ भी दिलाई गई है कि अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के लिए प्रज्वलित अग्नि को शांत नहीं होने दिया जाएगा।
     
अयोध्या में हुई इस धर्मसभा में मोदी सरकार से मांग की गई है कि मंदिर निर्माण शीघ्र कराने के लिए या तो संसद में कोई विधेयक लाए या अध्यादेश जारी करे। आश्चर्य की बात है कि आरएसएस सहित अन्य संगठन अभी तक इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बात मानने की बात कर रहे थे लेकिन अब वे अचानक बदले हुए सुर में बोल रहे है। संघ प्रमुख मोहन भगवत ने कहा कि यह मुद्दा यदि सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता में नहीं है तो भी सरकार सोचे कि मंदिर निर्माण के लिए कानून कैसे बनाया जाए। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अगले साल जनवरी से प्रारंभ होने जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि सरकार यदि इसके लिए कोई विधेयक संसद में लाती है या अध्यादेश जारी करती है तो क्या कोर्ट में उसे चुनौती नहीं दी जाएगी। वैसे यह मान लेना भी जल्दबाजी होगा की सरकार इन दोनों में से कोई एक रास्ता चुनने के लिए  तैयार हो जाएगी। कुल मिलकर एकमात्र रास्ता यही है कि कोर्ट के बाहर इस मसले का कोई हल खोजने का एक और अंतिम प्रयास किया जाए। सुप्रीम कोर्ट भी पहले यही बात कह चुका है। 
 
इधर अयोध्या मामले को गर्माते देख शिवसेना ने जिस तरह इसमे दिलचस्पी दिखाना प्रारम्भ कर दिया है उससे यह स्पष्ट होता है कि वह भी श्रेय लेने में पीछे नहीं रहना चाहती।  शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने लगभग चार हजार शिवसैनिकों के साथ अयोध्या पहुंचकर साधु संतों के साथ अपनी उपस्थिति अगर दर्ज कराई है तो क्या उसकी वजह यह नहीं हो सकती है कि वे आगे चलकर यह दावा कर सके कि वह सरकार पर दबाव बनाने में सफल हुई है। उद्धव यदि सरकार से राम मंदिर निर्माण जल्द कराने की मांग यदि करना चाहते है तो वे यह महाराष्ट्र में भी रहकर यह कर सकते थे। यहां यह सवाल भी उठता है कि वे चार सालों तक चुप क्यों रहे। अब इससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में अपने दम पर चुनाव लड़ने वाली शिव सेना इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। 
 
इस मामले में कांग्रेस ने तो अपनी स्थिति हास्यास्पद बना ली है। एक और वह खुद को सॉफ्ट हिंदुत्व की और झुका रही है लेकिन दूसरी और वह अल्पसंख्यकों की हितैषी भी बने रहना चाहती है। हाल ही में राजस्थान के बड़े कांग्रेसी नेता सीपी जोशी ने तो यह दावा कर दिया कि अयोध्या में राम लला का ताला कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने ही खुलवाया था और अब मंदिर भी कांग्रेसी प्रधानमंत्री ही बनाएगा। कांग्रेस खुद ही असमंजस में है कि वे इस मामले में कौन सा रास्ता अपनाए। कांग्रेस पर तो प्रधानमंत्री मोदी सीधे आरोप लगा रहे है कि मंदिर निर्माण में हो रहे विलंब के लिए वह ही जिम्मेदार है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने तो वकील की हैसियत से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अगले  लोकसभा चुनाव के बाद करने का अनुरोध किया था। कोर्ट ने भले ही उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया लेकिन इससे भाजपा को कांग्रेस को घेरने के लिए मौका जरूर मिल गया। 
 
अयोध्या में जिस तरह साधु संतों ने सरकार पर यह भरोसा दिखाया है कि व 11 दिसंबर के बाद इस पर फैसला जरूर लेगी तो अब यह उत्सुकता विषय बन गया है कि सरकार वाकई में क्या कोई निर्णय ले चुकी है और अब बस इसकी घोषणा बाकी है। कुल मिलकर यह इतना पेचीदा मामला है कि सरकार के लिए इस पर ऐसा फैसला लेना आसान नहीं है जो सभी पक्षों को मान्य हो। एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि मंदिर निर्माण के लिए सरकार पर दबाव बनाने का जो सिलसिला शुरू हुआ है वो आसानी से थमने वाला नहीं है। अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से इसे चुनावी मुद्दा बना ले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है।

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