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बढ़ती असहिष्णुता को देखकर प्रतीत होता है कि विश्व्बंधुत्ता खतरे में पड़  चुकी है।…

आज पूरे देश में धार्मिक कट्टरता व जातिवादी उन्माद तेज़ी से फैल रहा है. ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरी दुनिया में इंसानियत का नामोनिशान मिट चुका हो .अभी सीरिया पर हो रहे हमले में 5 दिन में 97 बच्चों समेत 403से ज्यादा लोग मारे गए हैं. पिछले 72 घंटों में 22 अस्पताल और डिस्पेंसरी तबाह हो गए हैं। मानवाधिकार संगठन सीरियन आब्जर्वेटरी के मुताबिक रविवार के बाद से अब तक हमलों में करीब 1500 लोग घायल हो गए हैं। घायलों का इलाज भी नहीं हो पा रहा है। सबसे बुरी स्थिति बच्चों की  है उन्हें इलाज तक नहीं मिल पा रहा है.
यह सब देख कर लगता है मानो चारों तरफ नफरत का जहर हवाओं में घुल गया हो…. मानो हर कोई दुसरे से सिर्फ दुश्मनी का रिश्ता निभा रहा हो… इन सब हलातों को देखते हुए भगत सिंह का एक लेख याद आया जिसमें उन्होंने हमे विश्वबन्धुता के मार्ग पर चलने को कहा है- मैं विश्वबन्धुता का अनुगामी हूँ,’Universal brotherhood’का समर्थक हूँ | ‘विश्वप्रेम’ नामक उनके एक लेख में विश्व की कल्पना ‘विश्वबन्धुता’ के साथ की गयी है और विश्वबन्धुता का अर्थ संसार में समानता से दी गयी है| वे कल्पना करने के लिए प्रेरित करते हैं ……..कि ‘सभी अपने हों, कोई पराया नही हो,कैसा होगा वो सुखमय समय, जब संसार से परायापन सर्वथा नष्ट हो जायेगा,
जिस दिन यह सिद्धांत समस्त संसार में व्यावहारिक रूप से परिणत होगा, उस दिन संसार उन्नति के शिखर को छू सकेगा. | जिस दिन प्रत्येक मनुष्य इस भाव को हृदयंगम कर लेगा, उस दिन संसार कैसा होगा?जरा कल्पना तो करें !……… उस दिन हर तरफ शांति होगी. ‘, हमें  संसार को इस सिद्धांत के स्वागत के लिए तैयार करना होगा| उस आशामयी खेती के लिए हमें खेतों से नफरत के फसल उखाड़ फेंकने होंगे |कांटेदार झाड़ियों को जलाकर शांति के फूल लगाने होंगे | हमें घोर परिश्रम करना होगा| निचली पायदान पर खड़े लोगों का उत्थान करना होगा| तरक्की की राह में पिछड़े लोगों  को उन्नति का मार्ग दिखाना होगा|
मिथ्या शक्तिवादियों को घसीट कर अपने साथ खड़े होने पर विवश करना होगा| अहंकारियों का अहंकार तोड़ना चाहिए. निर्बलों को बल, पराधीनो को स्वाधीनता,निराशावादियों को आशा, भूखों को रोटी, बेघरों को घर,  अंधविश्वासियों में तार्किकता का पोषण करना होगा. क्या लोग इतना काम करेंगे”….| मुझे तो लगता है ..कि सारे ‘वाद’ छोड़ के ‘भगतवाद’ शुरू करने का समय आ गया है…..
उनके ‘विश्वप्रेम’ के अनुसार ‘आज तुम गुलाम हो, पराधीन हों,परतंत्र हो, बंदी हो, तुम्हारी यही बात आज ढोंग प्रतीत होती है, एक आडम्बर दिख पड़ता है| बकवास मालूम देती है, क्या तुम इसका प्रचार करना चाहते हो?…..एक जगह वो कहते हैं ”जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित,धनी-निर्बल, छूत-अछुत आदि शब्द का प्रयोग होता है तब तक कहाँ विश्वबन्धुता और विश्वप्रेम” ! कोशिशें तो करनी पड़ेंगी..ना आज हम नही करेंगे तो कल को यह धरती जहनुम लगेगी….इतनी बढ़ती असहिष्णुता को देखकर प्रतीत होता है कि विश्व्बंधुत्ता खतरे में पड़  चुकी है ।

aditi katiyar

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