धर्म औरत के सहारे काम करता है, और उन्हें नियंत्रित भी करता है…

लेखक – अदिति कटियार

हालही में एक और हिजाब के रूप में नया मुद्दा  सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है जिस पर अब नई बहस शुरू हो गई है. इस विषय ने तब आग पकड़ ली जब ईरान की राजधानी तेहरान में 29 औरतो को पकड़ कर जेल में डाल दिया और जुर्माना भी लगाया गया. अब ये खबर पढ़ कर दिमाग में आया की इन औरतो ने जरुर ही कोई संगीन अपराध को अंजाम दिया होगा. सवाल उठा की आखिर इनका जुर्म क्या रहा होगा तो मालूम चला की वहां की पुलिस ने हिजाब ना पहनने के आरोप में 29 महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया था। इन सभी महिलाओं को इसलिए पकड़ा गया, क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर हिजाब नहीं पहना था। अब आपके मन में भी पहला सवाल ये आया होगा कि ईरान में ऐसा कौन सा कानून है…जो वहां की महिलाओं को बिना हिजाब के बाहर जाने पर उनको जेल भेज सकता है अपनी मर्ज़ी से रहने या कुछ भी पहनने का अधिकार नहीं देता। इसे समझने के लिए आपको इतिहास के पन्ने पलटने होंगे…

 

ईरान में 1979 से पहले पहलवी वंश का शासन था.1941 रेज़ा शाह पहलवी गद्दी बैठा जिसने औरतो के हक के लिए काफी कदम उठाये लडकियों की शिक्षा के लिए स्कूल बनवाए और शाह पहलवी के शासनकाल में नकाब को प्रतिबंधित कर दिया गया था. स्त्रिया बिना बुर्के के भी सार्वजनिक स्थानों पर जा सकती थी। पर ईरान में 1979 की क्रांति के बाद इस्लामिक कानून लागू किया गया, तब से ईरान की महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य हो गया और यह देश में आने वाली विदेश महिलाओं पर भी लागू होता है। इस कानून का उल्लंघन करने के लिए कठॊर दंड भी हो सकता है। दंड के रूप में दो महीने तक जेल की सज़ा और 74 कॊड़ा मारा जा सकता है. 1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान की औरतो को पूरी तरह अपाहिज और असहाय कर दिया।

 

 

 

 

इस्लाम में महिलाओं के आज़ादी पर पाबंदी लगाई गयी है।  पुरषों  का कई महिलाओं से शादी करना हो या तीन तलाक दे कर बीवी से पल्ला झाड़ना हो। परिवार सुरक्षा अधिनियम को खत्म किया गया, बच्चों को रखने का अधिकार औरतों से छीन लिया गया। पुरुष एक स्थायी पत्नी के अलावा कई अस्थायी पत्नियां रख सकते हैं और महिलाओ के बाहर आने जाने पर भी रोक लगायी गयी  ऐसी पार्टियों में नहीं जा सकतीं, जहां मर्द-औरत दोनों साथ हों और पुरुष औरतों के आवागमन को कभी भी, कैसे भी रोक सकते हैं। शाह के काल में औरतों ने जितनी तरक्की की, 1979 के आधुनिकता के प्रभाव से बचने के प्रयास में पनपे धार्मिक पुनरुत्थान के पागलपन ने औरतो के हाथो से सब छीन लिया

 

 

 

1979 में इस्लामिक क्रांति की के बाद, से ईरानी की महिलाएं अपने ऊपर लगे कट्टर कानूनों और नियमों में बदलाव लाने की कॊशिश में जुटी हुई हैं। हिजाब के विरोध प्रदर्शन को तेज़ी तब मिली जब पिछले साल एक 31 वर्ष की महिला जिसको ईरान में “Girl of Enghelab Street” के नाम से जानते हैं उसने बाज़ार में सड़क के बीचों बीच खड़े रह कर अपने हिजाब को एक छड़ी पर बांध कर लहराया था. बाद में पता चला कि उस महिला का नाम विदा मुहावीद है और उसका 19 महीने का एक छॊटा सा बच्चा भी है। इरान की महिलाएं विदा को अपने ‘हीरे’ मानने लगी हैं ईरान जैसे कट्टर इस्लामिक देश में सरकार के खिलाफ़ अपने हक के लिए लड़ना कोई छोटी बात नहीं है इस्लाम की आढ़ में मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकार से दूर रखा गया है. विदा ईरान के इन्ही कट्टर नियमो में परिवर्तन लाने की कॊशिश कर रही है। इसके बाद विदा को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है लेकिन फिर भी वह पूरी दुनिया का ध्यान अपने ओर खींचने में सफल रही है.

 

 

आज अचानक ईरान की सड़को,चौराहों पर जो औरते अपने हिजाब को हाथ में लेकर हवे में लहराती नजर आ रही है ये कोई अचानक होने वाली पर्तिक्रिया नही है ये वह आग है जो इन महिलाओं के भीतर काफी लम्बे समय से जल रही थी यह ईरान की महिलाओं के अंदर का दबा-छुपा विद्रोह है जो आज खुलकर सामने आया है ईरान की ये औरते भीड़ में अपना हिजाब उछालकर अपनी निजी ज़िंदगी में निर्णय लेने की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार की मांग कर रही हैं। वे समाज को बताना चाहती है की चयन का अधिकार भी उनका होता है. इन अधिकारों की चाह ही इन औरतो के के लिए सबसे बड़ा मानव अधिकार है और यह इनका हक जिसे पाने से कोई नही रोक सकता…, अब यहाँ कुछ लोगो को लगेगा की मात्र परिधान या कपड़ो के माध्यम से ये महिलाए क्या हासिल कर लेंगी.?

लेकिन कोई भी राय बनाने से पहले यह जानना जरुरी है की ईरान की औरते यहा समझाने की कोशिश कर रही हैं की यहा शरीर हमारा है इसे हम किस और कैसी पोशाक से ढकना चाहते है इसका फैसला हम खुद करेंगे और कोई नही.इससे यह बिलकुल भी नही है की वे हिजाब का विरोध कर रही है इस आंदोलन में वो किसी कपड़े के एक टुकड़े के खिलाफ नहीं है, वो अपने सम्मान के लिए लड़ रही हैं वे बस खुद पर अपने   मालिकाना हक के लिए लड़ रही है जो जायज है. अकसर ही औरतो महिलाओ के अधिकारों को धर्म की बलि चढ़ा दिया जाता और जिस वजह से महिलाओं को अपने अस्तित्व को लेकर अधिक संघर्षरत होना पड़ता है। आमतौर पर महिलाओं को केवल घरेलू निर्णय लेने का अधिकार ही मिल पाता है और यह भी उसके खुद के अपने निर्णय नहीं होते, बल्कि पारिवारिक फैसले होते हैं। हमारा समाज स्त्रियों को धर्म का एजेंट भी समझता है और सब्जेक्ट भी हमारा कोई खुद का स्वरुप नही होता. धर्म उनके सहारे काम करता है और उन्हीं को नियंत्रित भी करता है। लेकिन अब एक एक कर महिलाएं इन पाबंदियों की जंजीरॊं से छूट रही है। बदलाव का बिगुल बज चुका है और निश्चित ही बदलाव होके रहेगा।

 

 

 

 

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