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महान भारतीय विचारक ज्‍योतिबा फुले के बारे में जाने 5 बाते …

ज्‍योतिराव जयंती आज , जो महान भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक और क्रांतिकारी ज्‍योतिराव गोविंदराव फुले  का आज जन्‍मदिन है. ज्‍योतिबा फुले के नाम से मशहूर इस महात्‍मा ने दलितों के उत्‍थान और महिला सुधार के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया. वे जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के सख्‍त विरोधी थे.

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उनके जीवन से जुड़ी 5  बातें जाने  –

1-ज्‍योतिबा फुले ने कुछ समय तक मराठी में पढ़ाई की. लेकिन लोग उनके पिता से यह कहने लगे कि अगर आपका बेट स्‍कूल जाएगा तो किसी काम का नहीं रह जाएगा. फिर क्‍या लोगों की बातों में आकर पिता गोविंद ने उनका स्‍कूल छुड़ा दिया. बाद में कुछ लोगों ने उन्‍हें समझया क‍ि ज्‍योतिबा तेज दिमाग हैं उन्‍हें पढ़ाना चाहिए. तब कहीं जाकर उन्‍होंने 21 साल की उम्र में अंग्रेजी की सातवीं क्‍लास की पढ़ाई पूरी की. साल 1840 में वे सावित्री बाई के साथ शादी के बंधन में बंध गए.
2-ज्‍योतिबा फुले का जन्‍म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था. उनका परिवार फूलों के गजरे बनाने का काम करते थे. यही वजह थी कि उनके परिवार को फुले के नाम से जाना जाता था. जब ज्‍योतिबा सिर्फ एक साल के थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया.

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3-ज्‍योतिबा फुले को एहसास हो गया था कि ईश्‍वर के सामने स्‍त्री-पुरुष दोनों का अस्तित्‍व बराबर है. फिर दोनों में भेद-भाव करने का कोई मतलब नहीं. ऐसे में स्त्रियों की दशा सुधारने और समाज में उन्‍हें पहचान दिलाने के लिए उन्‍होंने 1854 में एक स्‍कूल खोला. यह देश का पहला ऐसा स्‍कूल था जिसे लड़कियों के लिए खोला गया था. स्‍कूल में पढ़ाने का जिम्‍मा उन्‍होंने पत्‍नी सवित्री को सौंप दिया.
समाज के ठेकेदारों को यह बात पसंद नहीं आई और उन्‍होंने ज्‍योतिबा के पिता पर दबाव बनाकर पत्‍नी समेत उन्‍हें घर से बाहर निकलवा दिया. इन सबके बावजूद ज्‍योतिबा का हौसला डगमगाया नहीं और उन्‍होंने लड़कियों के तीन-तीन स्‍कूल खोल दिए.
4-ज्‍यातिबा फुले दलित उत्‍थान के हिमायती थे. उन्‍होंने न सिर्फ विचारों से दलितों को सम्‍मान दिलाने की बात कही बल्‍कि अपने कर्मों से भी ऐसा करके दिखाया. उन्‍होंने दलितों के बच्‍चों को अपने घर में पाला और उनके लिए पानी की टंकी भी खोल दी. नतीजतन उन्‍हें जाति से बहिष्‍कृत कर दिया गया.
5-समाज के निम्‍न तबकों, पिछड़ों और दलितों को न्‍याय दिलाने के लिए ज्‍योतिबा फुले ने ‘सत्‍यशोधक समाज’ की स्‍थापना की. उनकी समाज सेवा से प्रभावित होकर 1888 में मुंबई की एक सभा में उन्‍हें ‘महात्‍मा’ की उपाधि से नवाजा गया.


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