होइहि सोई जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा

कृष्णमोहन झा

सदियों पुराने अयोध्या विवाद पर गत वर्ष 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने जब अपना  ऐतिहासिक फैसला सुनाया और उसे सभी संबंधित पक्षों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया तभी से सारा देश अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के शुभारंभ की अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा था। करोड़ों राम भक्तों की वह अधीर प्रतीक्षा आगामी 5 अगस्त को अभूतपूर्व उल्लास का रूप लेने जा रही है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों  मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन का यह गरिमामय कार्यक्रम संपन्न होगा। कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए यद्यपि यह बहुप्रतीक्षित कार्यक्रम अत्यंत संक्षिप्त होगा, परंतु उन चंद पलों में ही इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत होने जा रही है।

भूमिपूजन के कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत तो यद्यपि 3 अगस्त को हो चुकी है, परंतु भूमि पूजन का मुख्य कार्यक्रम 5 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के हाथों संपन्न होगा। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, आर एस एस के सर संघचालक मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद रहेंगे। इस कार्यक्रम में न्यास द्वारा आमंत्रित किए जाने वाले अतिथियों की संख्या पहले अधिकतम 200 तय की गई थी परंतु अब उसे घटाकर 170 कर दिया गया है। गौरतलब है कि श्रीरामजन्म भूमि आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले भाजपा के दो मूर्धन्य नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री लालकृष्ण आडवाणी एवं डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने इस कार्यक्रम से वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़ने का फैसला किया है।

केंद्र सरकार के मंत्रियों और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया है। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के तत्वावधान में संपन्न होने जा रहे इस कार्यक्रम में संत समाज को विशेष महत्व प्रदान किया जाएगा। श्री राम मंदिर के भव्य भूमि पूजन समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के उत्सुक जिन लाखों रामभक्तों को कोरोना संकट ने अयोध्या पहुंचने से वंचित कर दिया है वे दूरदर्शन के माध्‍यम से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के साक्षी बन सकेंगे। डीडी न्यूज सहित सभी न्यूज चैनल पर इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया जा रहा है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि यदि देश इस समय कोरोना की महामारी से नहीं जूझ रहा होता तो अयोध्या में इस समय असंख्य रामभक्तों का सैलाब देखाई देता। उन लाखों-करोड़ों रामभक्तों के लिए अपने आराध्य के भव्य मंदिर के भूमि पूजन में दूरदर्शन के माध्यम से भागीदारी भी अपने आप में एक अनूठा रोमांच कारी अनुभव होगा।

सदियों पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया  उसे खुले हृदय से स्वीकार कर सद्भाव और सौहार्द्र की अनूठी मिसाल पेश करने वाले बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी और सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर अहमद फारुखी तथा अयोध्या निवासी पद्मश्री मोहम्मद शरीफ को भूमिपूजन समारोह में आमंत्रित कर श्रीराम जन्म भूमि तीर्थक्षेत्र न्यास ने जो विशाल हृदयता दिखाया है वह इस बात का प्रमाण है कि 5 अगस्त को भगवान राम की पावन जन्मभूमि अयोध्या में ही नहीं सांप्रदायिक सदभाव, सौहार्द्र और भाईचारे के एक स्वर्णिम युग की शुरुआत होने जा रही है। यह भी हर्ष और संतोष का विषय है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के भूमिपूजन समारोह की शुभ घड़ी नजदीक आने के साथ ही इसके पक्ष में सुखद वातावरण निर्मित होने लगा है।

हाल में ही मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम के आयोजन का स्वागत किया है। कमलनाथ ने कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हर भारतवासी की सहमति से हो रहा है यह भारत में ही मुमकिन है। हर भारत वासी की इच्छा और आकांक्षा थी कि अयोध्या में रामंदिर का निर्माण हो लेकिन कमलनाथ के इस तरह के बयान को देखते हुए दिग्विजय सिंह के उस बयान पर आश्चर्य ही व्यक्त किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने राम मंदिर निर्माण हेतु भूमि पूजन कार्यक्रम पर सवाल उठाए हैं। दिग्विजय सिंह का कहना है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी का सपना पूरा होने जैसा है परंतु भूमिपूजन के लिए जो मुहूर्त तय किया गया है वह सही नहीं है। यद्यपि कमलनाथ के समान दिगविजय सिंह भी यह मानते हैं कि देश की जनता अयोध्या में जल्द ही भव्य राम मंदिर के निर्माण की आकांक्षी है, परंतु दोनों की इस बारे में एक राय है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का संपूर्ण श्रेय की हकदार भाजपा नहीं है क्योंकि यह तो स्व. राजीव गांधी का ही सपना था।

दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के द्वारा इस समय जो बयान दिए जा रहे हैं उनसे उनकी इस चिंता का आभास होता है कि अयोध्या में रांम मंदिर का निर्माण आगे आने वाले समय में भाजपा के लिए एक ऐसी उपलब्धि साबित होगा जो जनता के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को नई ऊंचाईयों तक पहुंचा देगा। कांग्रेस इस समय जिस असमंजस की स्थिति का सामना कर रही है उसे समझना कठिन नहीं है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अयोध्या में भूमि पूजन के लिए निर्धारित मुहूर्त पर सवाल उठाते हुए कि कहा है कि भूमि पूजन के कार्यक्रम में हिन्दू धर्म की मान्यताओं की अनदेखी हो रही है। जाहिर सी बात है कि यह बहस जल्दी थमने वाली नहीं है। उधर, एआइएमआइएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी मांग कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अयोध्या में आयोजित राम मंदिर भूमि पूजन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के रूप में नहीं बल्कि केवल नरेंद्र मोदी के रूप में शामिल होना चाहिए। यह बात समझ के परे है कि प्रधानमंत्री पद और नरेंद्र मोदी को अलग-अलग कैसे देखा जा सकता है। क्या कुछ घंटों के लिए प्रधानमंत्री पद को दिल्ली में छोड़कर नरेंद्र मोदी अयोध्या जाएं तो वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होना चाहिए?

दरअसल, वास्तविकता तो शायद यह है कि यदि यह कार्यक्रम भारत से कोरोना संकट की पूरी तरह समाप्ति के बाद भी आयोजित किया जाता तब उसमें छिद्रान्वेषण होना ही था। सबके पास अपने-अपने कारण हैं और सभी को एक साथ संतुष्ट भी नहीं किया जा सकता। अब जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद की शिकायत यह है कि 5 अगस्त के कार्यक्रम में उनको आमंत्रित न किया जाना अनुसूचित जाति का अपमान है। उन्हें इसके पीछे साजिश दिखाई दे रही है। इसके जवाब में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी का यह कथन नि:संदेह गौर करने लायक है कि साधु की कोई जाति नहीं होती। सन्याय लेने के बाद सब बराबर हो जाते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि अयोध्या में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम के बारे में जो भी गिले-शिकवे सामने आ रहे हैं उनके पीछे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अथवा पूर्वाग्रह भी एक कारण है। इसे केवल उनकी व्यक्तिगत राय के रूप में देखना उचित होगा। जब हम 90 प्रतिशत हिंदुओं की मान्यताओं की बात करते हैं तब हम यह दावा नहीं कर सकते कि हमारे विचार से 90 प्रतिशत लोग सहमत हैं। सबको अपनी बात कहने का अधिकार है और उस अधिकार का सम्मान भी किया जाना चाहिए, परंतु हम सभी से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हमारी बात से सब सहमत हों। दरअसल, अब अतीत की कड़वाहट को भुलाकर आगे बढ़ने और सद्भाव एवं भाइचारे का एक नया अध्याय शुरू करने का समय है। इस लेख के अंत में मेरी अपनी राय तो यह है कि जिन्हें भी इस वाद विवाद में अपनी-अपनी जीत का पूरा भरोसा है। वे गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री रामचरित मानस की इन दो पंक्तियों को अगर आत्म सात कर लें तो शायद सारा विवाद ही शांत हो जाए।

होइहि सोई जो राम रचि राखा।  

को करि तर्क बढ़ावे साखा।।

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