कृष्णमोहन झा

ज्वलंत मुद्दों पर सार्थक चर्चा के पक्षधर हैं डॉ. मोहन भागवत

कृष्णमोहन झा

 

राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक (आरएसएस) के सरसंघ चालक डॉ. मोहन भागवत के सान्निध्य में जीवन के कुछ अनमोल पल व्यतीत करने का सौभाग्य जिन लोगों को मिला है, मैं भी उनमें से एक हूं। उनसे मेरी भेंट यद्यपि संक्षिप्त ही रही है, परंतु उन कुछ पलों की भेंट में ही उनके गहन गंभीर विचारों की गहरी छाप मेरे मानस पटल पर मानों हमेशा के लिए अंकित हो गई थी। उनकी संवाद अदायगी की क्षमता अद्भुत है। वे सरल शब्दावली में अपनी बात अपने सहज अंदाज़ में इस तरह कह जाते हैं कि सामने बैठा शख्स उनसे सहमत हुए बिना रह ही नहीं सकता। किसी भी मुद्दे पर किसी सरकार से अथवा किसी राजनीतिक दल से साथ मत वैभिन्य होने पर भी पलटवार करने में उनका विश्वास नहीं है। उनका हमेशा से यह मानना रहा है कि सबको अपनी बात कहने का अधिकार मिलना चाहिए और हमारे अंदर अपने विरोधी के विचार भी बिना किसी पूर्वाग्रह के धैर्य पूर्वक सुनने का साहस होना चाहिए। इस साहस की कमी कई बार हमें अच्छे विचारों को भी अपने मानस पटल पर अपनी छाप छोड़ने से रोक देती है।

डॉ. भागवत अपने विचारों को किसी पर थोपनेसे परहेज करते हैं। उनका हमेशा से ही यह मत रहा है कि विचारों का प्रवाह एक तरफा नहीं होना चाहिए। विचारों के आदान प्रदान से ही अच्छे विचार एक दूसरे तक पहुंचते हैं और अंतत: चिन्तन की शुचिता का मार्ग प्रशस्त होता है। चिन्तन की यही शुचिता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के चरम लक्ष्य तक की हमारी यात्रा कोसफल बना सकती है। डॉ. मोहन भागवत द्वारा आरएसएस के सर संघ चालक पद का उत्तरदायित्व ग्रहण किए जाने के बाद  संगठन का केवल गणवेश ही नहीं बदला है, अपितु काफी हद तक उसका स्वरूप भी बदला हुआ दिखाई देता है परंतु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में संघ की अडिग आस्था और विश्वास आज भी उसी रूप में उसकी ताकत बनी हुई है जैसी कि 1925 में संघ की स्थापना के समय थी।

डॉ. मोहन भागवत की अगुवाई में संघ के चिंतन और कार्यक्षेत्र का दायरा भी बढ़ा है। सर संघ चालक के रूप में समय-समय पर भागवत ने देश के ज्वलंत मुद्दों पर जो सार गर्भित विचार व्यक्त किए हैं, उनके माध्यम से वे एक समर्पित और सेवा भावी समाज सुधारक के रूप में हमारे सामने आए हैं। उनका मानना है कि विवादों का सर्वोत्तम समाधान केवल परस्पर संवाद से ही निकाला जा सकता है। इसलिए वे कहते हैं कि संवाद तो हमेशा कायम रहना चाहिए क्योंकि मुश्किल समय में संवाद  से ही कोई रास्ता निकाला जा सकता है। गौरतलब है कि लगभग एक माह पूर्व वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से दिए गए संदेश में भी श्री भागवत ने कहा था कि संवाद का सिलसिला निरंतर जारी रहना चाहिए। संघ प्रमुख तो उन लोगों के बीच भी परस्पर संवाद के पक्षधर हैं, जिनके विचार आपस में मेल न खाते हों। संवाद से ही समाज के व्यापक हित का मार्ग प्रशस्त होता है।

संघ पर यह आरोप भी जब तब लगते रहे हैं कि उसकी सोच का दायरा सीमित है परंतु मोहन भागवत ने इन सारी धारणाओं को गलत साबित किया है। दो वर्ष पूर्व जब मोहन भागवत की अगुवाई में नई दिल्ली में आयोजित एक सर्व समावेशी आयोजन में संघ ने अपने आलोचकों को भी अपने विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया तो संघ की विचारधारा के आलोचकों ने उस आमंत्रण को स्वीकार करने की सौजन्यता भी नहीं दिखाई। आश्चर्य तो तब हुआ जब कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को गत वर्ष आयोजित संघ के एक कार्यक्रम में शामिल होने से रोकने के लिए उन पर अनुचित दबाव बनाने के भरसक प्रयास किए।

उल्लेखनीय है कि प्रणव मुखर्जी ने सारे दबावों को दरकिनार करते हुए संघ के उक्त कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की थी। संघ के उक्त कार्यक्रम में प्रणव मुखर्जी के व्याख्यान को जिस तरह स्वयंसेवकों ने ध्यान से सुना वह इस बात का प्रमाण था कि संघ में सभी के विचारों का पूरा सम्मान किया जाता है। पूर्व राष्ट्रपति ने कांग्रेस की आपत्ति के बावजूद इस कार्यक्रम में व्याख्यान का आमंत्रण  स्वीकार कर वास्तव में पार्टी को भी यह संदेश दिया था कि संघ कोई ऐसी संस्था नहीं है, जिसके किसी कार्यक्रम में भाग लेने में किसी को कोई संकोच करने की आवश्यकता महसूस हो। अखंड भारत और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति के लिए संघ के द्वार हमेशा खुले रहे हैं।

कोरोना वायरस के संक्रमण को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से संपूर्ण देश में लागू लॉकडाउन के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से एक संदेश दिया था। उनका यह संदेश हालांकि संघ के स्वयंसेवकों के लिए था परंतु वह संदेश कोरोना संकट से निपटने के लिए अपने आप में किसी प्रेरक गाइड लाइन से कम महत्वपूर्ण नहीं था। संघ प्रमुख ने इस संदेश में स्वयंसेवकों का आह्वान किया था कि पहले उन्हें स्वयं अच्छा बनना है और फिर अपनी अच्छाई का उपयोग करते हुए दूसरों को भी अच्छा बनाना है। उनके इस कथन का आशय यही था कि हमारा आचरण ऐसा होना चाहिए कि हम दूसरों के लिए उदाहरण बन सकें। संघ प्रमुख ने लॉकडाउन के नियमों के पालन की अनिवार्यता पर बल देते हुए कहा था कि इस अवधि में हमें अपने घरों में रहकर प्रार्थना करना है। प्रार्थना हमें किसी भी संकट का सामना करने के लिए अंदर से मजबूत बनाती है। संघ प्रमुख ने इस सारगर्भित संदेश के माध्यम से समाज में सहयोग, सदभाव, समरसता और शांति का वातावरण निर्मित करने के लिए सामूहिक प्रयास करने पर विशेष बल देते हुए कहा था कि कोरोना संकट पर विजय हासिल करने के लिए आत्मानुशासन को जीवन में उतारना होगा। संघ प्रमुख ने अपने संदेश में जिस आत्मानुशासन पर विशेष बल दिया था, उसका जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महत्व है।

दरअसल, संघ प्रमुख का यह संदेश हमें इस सच्चाई का अहसास भी कराता है कि कोरोना की आपदा ने हमारी जीवन शैली में जो परिवर्तन ला दिया है उसके साथ तालमेल बिछाने का एक मात्र रास्ता आत्मानुशासन ही है। डॉ. भागवत जब बोलना प्रारंभ करते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते हैं। उनके भाषण में एक-एक शब्द नपा तुला हुआ होता है इसलिए उनके भाषणों में आप कहीं भटकाव नहीं देख सकते। पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भों से युक्त उनके व्याख्यानों में उनके अध्ययन, मनन और चिंतन की गहराई की सहज अनुभूति कराने की जो क्षमता है वह उनके विराट व्यक्तित्व की परिचायक है। अपने सारगर्भित विचारों को सहज सरल और बोधगम्य भाषा में पूरी स्पष्टता के साथ व्यक्त करते हैं। असहज कर देने वाले तीखे सवालों से भी वे कभी उत्तेजित अथवा विचलित नहीं होते। सीधी बात का जवाब उन्होंने घुमा फिरा कर कभी नहीं दिया।

डॉ. भागवत कहते हैं कि एक प्रजातान्त्रिक देश में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है परंतु यह आवश्यक नहीं कि सभी उससे सहमत हों। मैं भी जब अपने विचार व्यक्त करता हूं तो यह आवश्यक नहीं कि सभी मेरे विचारों से सहमत हों परंतु अगर मेरी बात किसी को सही प्रतीत होगी तो उसका सहमत होना स्वाभाविक है। हम किसी से सहमत अथवा असहमत हो सकते हैं परंतु संवाद की प्रक्रिया सतत जारी रहना चाहिए क्योंकि परस्पर संवाद से ही समाधान की राह निकलती है इसलिए वार्ता के द्वार हमेशा खुले रहना चाहिए परंतु यह बात ध्यान में रखना होगा कि वास्तविकता से अवगत होकर चर्चा करने के ही सार्थक निष्कर्ष निकलते हैं। सारी गलतफहमियां और भ्रम दूर करने के लिए संवाद ही एकमात्र रास्ता है।

राष्ट्र की एकता अखंडता और समाज से जुड़े विषयों पर संघ प्रमुख की टिप्पणियों ने कई बार विवादों को भी जन्म दिया है, परंतु ऐसी स्थिति प्राय: उनके शब्दों का गलत अर्थ निकाले जाने से ही निर्मित हुई। आरक्षण के संबंध में उनकी एक टिप्पणी को लेकर उनके पूर्वाग्रही आलोचकों ने यह दुष्प्रचार करने में कोई संकोच नहीं किया कि संघ प्रमुख आरक्षण के विरोधी हैं। संघ प्रमुख ने सारी शंकाओं का समाधान करते हुए स्पष्ट कहा था कि आरक्षण कोई समस्या नहीं है असली समस्या तो आरक्षण को लेकर होने वाली राजनीति है। सामाजिक विषमताओं को दूर करने के उद्देश्य से संविधान में समाज के पिछड़े और कमजोर वर्गों के लिए जो प्रावधान किए गए हैं संघ उनका सदैव पक्षधर रहा है। संघ का यह स्पष्ट दृष्टिकोण है कि समाज में सबके लिए समान अवसर होने चाहिए।

संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत किसी भी समुदाय के लिए अल्पसंख्यक शब्द के प्रयोग से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि हमारे यहां अल्पसंख्यक की परिभाषा ही स्पष्ट नहीं है। इस शब्द का प्रयोग तो अंग्रेजों ने शुरू किया। हम सब एक ही समाज के हैं और रहेंगे। उनका कहना है कि हम सब एक ही देश की संतान हैं तो फिर भेद कैसा? सबको भाई-भाई जैसे रहना है। डॉ. भागवत ने एक कार्यक्रम में कहा था कि रीति रिवाजों में भिन्नता हो सकती है परंतु सामाजिक समरसता सर्वोपरि है और संघ भी इसी अभियान में जुटा हुआ है कि जो बिखर गए हैं उन्हें जोड़ना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में ही देशवासियों से जिस आत्मनिर्भर भारत  अभियान में तन, मन, धन से योगदान करने का आह्वान किया था उसे और संघ के स्वदेशी अभियान को एक-दूसरे का पर्याय कहना अनुचित नहीं होगा। संघ प्रमुख ने लॉकडाउन के दौरान अपने एक संदेश में कहा था कि कोरोना का यह संकट हमारे लिए स्वालंबन का एक अवसर लेकर आया है। स्वदेशी अभियान के पीछे मूल भावना लोगों को स्वदेश में निर्मित वस्तुओं के उपयोग के लिए प्रेरित करना है। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी जरूरत की सभी वस्तुओं का देश के अंदर उत्पादन करने का सामर्थ्य अर्जित करें। हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि हमारे देश के अंदर निर्मित वस्तुएं गुणवत्ता की कसौटी पर भी खरी उतरें। मोहन भागवत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि कठिन समस्यायों का हल भी बातचीत के माध्यम से निकालने के प्रयास किये जाएं तो सार्थक परिणामों की संभावना हमेशा बनी रहती है।

आरक्षण को लेकर वर्षों से जारी विवाद को भी बातचीत के जरिए सुलझाने का सुझाव वे कई बार दे चुके हैं। इस संबंध में अपने बयानों से उपजी सारी शंकाओं का समाधान करते हुए संघ प्रमुख  स्पष्ट कहा था कि आरक्षण विवाद का हल निकालने के लिए आरक्षण के पक्षधर और आरक्षण के विरोधियों के बीच सदभावना पूर्ण बातचीत होनी चाहिए। संघ प्रमुख ने यह कभी नहीं कहा कि आरक्षण नहीं होना चाहिए परंतु आरक्षण के संबंध में उनके बयानों को लेकर जब तब कुछ राजनीतिक दलों ने अप्रिय विवाद भी खड़े किये हैं। मोहन भागवत का स्पष्ट मत है कि आरक्षण कोई समस्या नहीं है। असली समस्या तो आरक्षण को लेकर होने वाली राजनीति है। सामाजिक विषमताओं को दूर करने के उद्देश्य से संविधान में समाज के पिछड़े और कमजोर वर्गों के लिए जो प्रावधान किए गए हैं संघ उनका सदैव पक्षधर रहा है। संघ का यह स्पष्ट दृष्टिकोण है कि समाज में सबके लिए समान अवसर होने चाहिए। केंद्र की मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 और 35 को निष्प्रभावी करने और तीन तलाक की कुप्रथा के उन्मूलन हेतु जो साहसिक फैसले किए हैं उन्हें संघ का पूरा समर्थन देते हुए मोहन भागवत कहते हैं कि देश की एकता अखंडता को सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार द्वारा उठाए जाने कदमों को संघ का पूरा समर्थन है परंतु संघ सरकार के काम काज में हस्तक्षेप नहीं करता है। संघ पर सरकार को दिशा-निर्देश देने के आरोपों से इंकार करते हुए संघ प्रमुख ने हमेशा यही कहा है कि संघ सरकार को कभी दिशा-निर्देश नहीं देता। सरकार अपने मामले देखती है, संघ अपना काम देखता है। संघ के जो भी कार्यकर्ता भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश करके सत्ता अथवा संगठन में कोई दायित्व ग्रहण करते हैं  तो उस पर नजर रखना पार्टी का काम है। हम, केवल संस्कार देखते हैं। संघ की रुचि केवल इस बात में होती है कि हमारे कार्यकर्ता सुसंस्कृत हों, उनका चाल चरित्र आदर्श हो, बाकी बातो में न तो संघ की रुचि है न, उसे फुर्सत है।

सरसंघ चालक ने गत वर्ष नई दिल्ली में आयोजित ‘भविष्य का भारत’ कार्यक्रम में कहा था कि संघ का काम अनूठा है। उसकी तुलना किसी संगठन से करना उचित नहीं है। संघ हमेशा समाज सेवा से जुड़े अपने कार्यक्षेत्र पर ही ध्यान केन्द्रित करता है। संघ प्रचार और प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागता लेकिन उसके कार्यों की चर्चा होती है तो वह संघ की स्वीकार्यता का ही परिचायक है। मोहन भागवत कहते हैं कि संघ इस देश में एक शक्ति के रूप में उपस्थित है। समाज सुधार और मानव सेवा के  क्षेत्र में संघ समर्पित भाव से जो कार्य कर रहा है उसकी चर्चा केवल देश के अंदर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में हो रही है। संघ की शक्ति बढ़ती है तो कुछ लोगों को डर भी लगता है जो अस्वाभाविक नहीं है। मोहन भागवत ने ‘भविष्य का भारत’ कार्यक्रम में कहा था कि संघ ने यह कार्यक्रम इसीलिए आयोजित किया है ताकि सभी को संघ को समझने का मौका मिले। मैं किसी को अपने विचारों से सहमत नहीं करना चाहता, केवल चर्चा हो यही पर्याप्त है। संघ पर हमेशा ही कट्टर हिंदुत्व को बढ़ावा देने के जो आरोप लगाए जाते हैं उनके बारे में संघ प्रमुख ने अनेक मंचों से यह स्पष्टोक्ति की है कि संघ तो हिंदुत्व की किसी वाद के रूप में व्याख्या के ही पक्ष में  नहीं है। गत वर्ष ‘भविष्य का भारत’ कार्यक्रम में हिंदुत्व में संघ की आस्था से जुड़े एक सवाल के जवाब में डॉ. भागवत ने कहा था कि हिंदुत्व तो एक जीवन पद्धति है जिसे केवल एक धर्म से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। गांधी जी तो कहा करते थे कि सत्य की अनवरत खोज का नाम ही हिंदुत्व है। यह एक गतिशील प्रक्रिया है, जो सतत चलती रहती है। विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है।

भागवत कहते हैं कि पूजा पद्धतियां अलग-अलग हो सकती हैं परंतु हम सब एक समाज के हिस्सा थे और रहेंगे। हमें सबको साथ लेकर चलना है। बंधुभाव को वैचारिक आधार प्रदान करने का विचार ही हिंदुत्व है। विविधताओं में एकता का नाम ही हिंदुत्व है। इस विविधता में ही हमारी शक्ति निहित है। भागवत किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में परिभाषित किए जाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि हमारे देश में अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग अंग्रजों ने प्रारंभ किया। हमें सबको समान दृष्टि से देखना है। साथ मिलकर रहना है और राष्ट्र की प्रगति में मिल जुलकर योगदान करना है।

संघ प्रमुख डॉ. भागवत का यह दृढ़ मत है कि समाज में महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस पहल किए जाने की आवश्यकता है। हमारे देश में नारी को शक्ति स्वरूपा माना गया है। महिलाएं जीवन के अनेक क्षेत्रों में पुरुषों से बेहतर काम कर रही हैं। उन्हें समाज में बराबरी का हक मिलना चाहिए। संघ प्रमुख ने एक मंच से कहा था कि सरकार महिलाओं के हित में कानून बना सकती है परंतु उनके प्रति स्वस्थ दृष्टि विकसित किए जाने की आवश्यकता है और इसकी शुरुआत परिवार से होना चाहिए।

सरसंघ चालक पद की बागडोर मोहन भागवत के हाथों में आने के बाद संघ का न केवल स्वरूप बदला है बल्कि उसके कार्य क्षेत्र का भी विस्तार हुआ है। इसे भी एक सुखद संयोग ही कहा जा सकता है कि जब अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहसिक फैसले ने वहां भव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है तब सरसंघ चालक पद की बागडोर मोहन भागवत संभाले हुए हैं। इसमें दो मत नहीं हो सकते कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण में भी मोहन भागवत की भूमिका महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। आज देश में ज्वलंत मुद्दों पर मोहन भागवत की राय के विशेष मायने होते हैं। संघ भले ही एक राजनीतिक संगठन ना हो परंतु  संघ प्रमुख के रूप में मोहन भागवत ने साबित कर दिया है कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी राय की अनदेखी नहीं की जा सकती।

प्रदेश की धड़कन, 'इंडिया जंक्शन न्यूज़' के ताजा अपडेट पाने के लिए जुड़ें हमारे फेसबुक पेज से...

Check Also

चीन को आर्थिक मोर्चे पर मात देने से ही बनेगी बात

कृष्णमोहन झा हम एक बार फिर अपने पड़ोसी देश चीन के छल का शिकार हो …

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com