कृष्णमोहन झा

चीन को आर्थिक मोर्चे पर मात देने से ही बनेगी बात

कृष्णमोहन झा

हम एक बार फिर अपने पड़ोसी देश चीन के छल का शिकार हो गए। पिछले कुछ दिनों चीन के साथ सैन्य स्तर की थोड़ी सी वार्ता के बाद ही हम अपने पड़ोसी देश की बातों में आ गए। उसने हमारी जमीन पर अपना नाजायज कब्जा छोड़ने का हमें आश्वासन दिया और हमने झट यह मान लिया कि अतीत में कई बार हमें अपने छल का शिकार बना चुका हमारा पड़ोसी देश इस बार हमारे साथ कोई विश्वासघात नहीं करेगा।

इधर, हम वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी विवाद का जल्द ही शांतिपूर्ण समाधान निकल आने की उम्मीदों के फलीभूत होने की प्रतीक्षा कर रहे थे और उधर चीन हमारी उम्मीदों पर पानी फेरने की साजिश रचने में जुटा हुआ था और आखिर में वही हुआ, जिसकी आशंका को हम हमेशा नकारते आए हैं। इस बार भी हमारी उम्मीदों पर चीन के धोखे ने पानी फेर दिया। लद्दाख क्षेत्र में 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने निहत्थे भारतीय सैनिकों के साथ जो क्रूरता दिखाई वह उसकी ऐसी शर्मनाक कायराना हरकत थी, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। इस हमले में भारतीय सेना के एक कर्नल सहित 20 जवान शहीद हो गए। भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई में चीन के भी 43 सैनिक मारे गए और उसे भी काफी नुकसान पहुंचा।

आश्चर्य की बात तो यह है कि चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में दोनों देशों के बीच हुई हिंसक झड़प के लिए भारतीय सेना को जिम्मेदार ठहराने में भी कोई देर नहीं की। चीन की इस हरकत पर सारे देश में आक्रोश है। देश के कई भागों में चीनी सामान की होली जलाई जा रही है और चीन से आयात किए जाने सामान का बहिष्कार करने के एक अभियान की भी शुरुआत हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि देश की सीमा पर वीर जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। सारा देश भी यही चाहता है कि चीन को इस बार ऐसा सबक सिखाया जाए कि वह दोबारा भारत को धोखा देने की हिमाकत न कर सके।

एक कहावत है कि ‘दूध का जला, छाछ भी फूंक-फूंक पीता है’ अब जब भी चीन के साथ सीमा विवाद समाधान की उम्मीद करें तो हमें इस कहावत में छिपे भावार्थ को कभी नहीं भूलना चाहिए। चीन की कुटिलता इस बात से भी जाहिर होती है कि उसने भारतीय सैनिकों पर तब आक्रमण किया जब वे पूरी तरह निहत्थे थे और यही नहीं, भारतीय सैनिकों पर चीन के सैनिकों ने लोहे के कांटेदार तारों में लिपटी लाठियों एवं पत्थरों से हमला करके खुद ही यह साबित कर दिया कि अपनी घृणित मानसिकता का प्रदर्शन करने में भी उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती।

चीन की कुटिलता इस बात से भी जाहिर हो जाती है कि उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सोची समझी खुराफात करने के लिए यह नाजुक समय चुना जब भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण की रफ्तार रोजाना भयावह गति से बढ़ रही है और उस पर नियंत्रण पाने के सारे उपाय निष्फल सिद्ध हो रहे हैं। वैसे भी जब चीन को इस बात के लिए कोई शर्मिंदगी नहीं है कि जिस जानलेवा वायरस ने दुनिया भर में लाखों जिन्दगियों को लील लिया है, उसका जन्म उसके अपने वुहान शहर में स्थित एक प्रयोगशाला में हुआ था तब यह तो कल्पना ही व्यर्थ है कि निहत्थे भारतीय सैनिकों पर हमले और उसके लिए यह नाजुक समय चुनने पर उसके अंदर कभी शर्मिंदगी का भाव जागेगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोरोना संकट की ताज़ा स्थिति पर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा के दौरान दो टूक कहा है कि भारत की अखंडता और संप्रभुता को कोई चुनौती नहीं दे सकता। हम ऐसी हर चुनौती का प्रतिकार करने में समर्थ हैं। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सीमा पर हमारे जो सौनिक मारते-मारते मरे हैं उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री के इस कथन का आशय यही है कि हम चीन को उसकी इस हिमाकत का मुंहतोड़ जवाब दिए बिना चैन से नहीं बैठेंगे। सीमा पर तैनात सैनिकों को सरकार की ओर से पूरी छूट दे दी गई है। अब सारा देश यह जानने के लिए उत्सुक है कि चीन के साथ हिसाब चुकता करने के लिए सरकार उसके विरुद्ध किस तरह की कार्रवाई करने का मन बना चुकी है। यद्यपि चीन के साथ हिंसक झड़प में चीन के जो सैनिक मारे गए हैं, उनकी संख्या हमारे शहीद सैनिकों से कहीं अधिक है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन के कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के दौरान जो दबाव बनाया उसके फलस्वरूप चीन को भारत के 10 जवानों को भी छोड़ना पड़ा है, जिनमें दो अधिकारी भी शामिल हैं लेकिन इस घटना के बाद चीन अपनी खुराफात से बाज आएगा, यह मान लेना हमारी भूल होगी। गौरतलब है कि गलवान घाटी के जिस हिस्से में यह हिंसक झड़प हुई उसे चीन अभी भी अपना भूभाग बता रहा है, जबकि भारत यह स्पष्ट कह चुका है कि गलवान घाटी भारत का ही हिस्सा है। जाहिर सी बात है कि चीन इतनी आसानी से रास्ते पर नहीं आएगा लेकिन इस मुद्दे पर देश के अंदर जो राजनीति हो रही है उसके लिए यह अवसर उचित नहीं है। प्रधानमंत्री के बारे में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जो टिप्पणियां कर रहे हैं उनसे तो विपक्ष भी सहमत नहीं है।

प्रधानमंत्री ने विगत दिनों जो सर्वदलीय बैठक बुलाई थी उसमें भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ऐसे सवाल, उठाए जो राहुल गांधी पहले ही कर चुके हैं परंतु इस सर्वदलीय बैठक में राकांपा अध्यक्ष शरद पवार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी जैसे विरोधी नेताओं ने भी जब राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता से जुड़े इस मुद्दे पर सरकार के साथ एकजुटता प्रदर्शित की तब कांग्रेस से ऐसे सवालों की अपेक्षा नहीं थी, जिनका चीन हमारे देश के विरुद्ध दुष्प्रचार करने में इस्तेमाल कर सकता है। चीन ने वास्तविक सीमा रेखा पर जो खुराफात की है, उसके पीछे कई कारण हैं लेकिन तात्कालिक कारण तो यही माना जा रहा है कि जिस कोरोना वायरस ने सारी दुनिया में हाहाकार की स्थिति पैदा कर दी है उसकी उत्पत्ति चीन की एक प्रयोगशाला में होने के आरोपों को नकारने की सारी कोशिशों में उसे असफलता हाथ लगी है।

दुनिया के कई देश यह मानते हैं कि चीन को इसकी जांच के लिए अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम को अपने यहां अनुमति देना चाहिए। भारत ने इस पहल का समर्थन किया है। चीन ने इस खुराफात के जरिए अंतर्राष्ट्रीय जगत का ध्यान मोड़ने की कोशिश की है। वह दक्षिण एशिया में भारत के बढ़ते प्रभाव से भी चिंतित है। उसे यह बात अच्छी तरह मालूम है कि इस इलाके में भारत के पास ही उसके प्रभुत्व को चुनौती देने का साहस और सामर्थ्य है। अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती निकटता व जी-7 समूह का दायरा बढ़ाकर इस समूह में भारत को भी शामिल करने की अमेरिकी पहल से भी वह खफा है। इन सब कारणों के अलावा गलवान घाटी इलाके में भारत द्वारा सड़क का निर्माण उसकी खीज का एक प्रमुख कारण है। गलवान घाटी से लगा हुआ अक्साई चिन्ता इलाके पर चीन का कब्जा है।

पूर्वी लद्दाख में गत 15 वर्षों से भारत जो 255 किलोमीटर लंबी सड़क बना रहा है उसके निर्माण पर चीन की आपत्ति को दरकिनार करते हुए सड़क का निर्माण कार्य  भारत ने नहीं रोका है। विस्तारवादी चीन इस इलाके पर अपना दावा जताता रहा है। इस सड़क के बन जाने के बाद भारतीय सैनिकों को पूर्वी लद्दाख में आने-जाने में काफ़ी सहूलियत होगी। यही बात चीन को परेशान कर रही है, इसलिए भी चीन ने वास्तव में भारत को परोक्ष धमकी देने की मंशा से यह हमला किया। चीन लगभग दो माह से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर खुराफात करके भारत को परेशान करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। हमें उसकी इन कोशिशों को विफल बनाने के लिए हथियारों के प्रयोग से पहले और दूसरे विकल्पों पर भी गंभीरता से सोचना होगा। इनमें सबसे अच्छा विकल्प यह है कि चीन को आर्थिक मोर्चे पर मात दी जाए, पर इसके लिए हमें चीन पर अपनी निर्भरता लगातार कम करनी होगी और  स्वदेशी के मंत्र को अपने जीवन में उतारना होगा। हमें चीन में निर्मित जीवनोपयोगी वस्तुओं का बहिष्कार केवल वर्तमान विवाद के सुलझ जाने तक नहीं करना है बल्कि हमें अब यह संकल्प ले लेना चाहिए कि हम चीन में निर्मित वस्तुओं का भविष्य में भी कभी इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसी सिलसिले में कई प्रदेशों के व्यापारी संगठनों ने चीनी उत्पाद नहीं बेचने का जो फैसला किया है वह स्वागतेय है। हम अतीत में भी ऐसा कर चुके हैं परंतु हम अपने फैसले पर पहले ही अडिग रहे होते तो चीन भी काफी हद तक सुधर गया होता।

खैर, तब नहीं तो अब सही। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। सीमा पर हिंसक झड़प के बाद रेल मंत्रालय ने चीन की एक कंपनी को दिया गया 471 करोड़ रुपये का ठेका रद्द कर दिया है। गौरतलब है की कंपनियों ने भारत में भारी निवेश कर रखा है। हम चीन को जितना निर्यात करते हैं, उसका करीब दोगुना चीन से आयात करते हैं। चीन दीर्घ काल से भारतीय बाजार पर कब्जा जमाने की मंशा पाले हुए हैं। हमें चीनी उत्पादों पर निर्भरता को न्यूनतम स्तर पर ले जाने का अभियान को कभी विराम नहीं देना चाहिए। चीन से इतने धोखे खाने के बाद हमें यह मान लेना चाहिए कि चीन वह देश नहीं हो सकता जिस पर हम आंख मूंद कर भरोसा कर सकें|

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