भगवान कृष्ण मध्यस्थ थे क्या महाभारत टल गया?

 

लेखक

एस.पी.मित्तल

 

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के संदर्भ में।
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8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में भगवान राम के मंदिर निर्माण के संबंध में रिटायर जज इब्राहिम कलीफुल्ला की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर दी है। अब यह कमेटी हिन्दू और मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर मंदिर निर्माण पर सहमति बनवाएगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि विवाद का कोई हल आपसी सहमति से हो जाए और जिन तीन व्यक्तियों को मध्यस्थ बनाया गया है, उन्हें सफलता मिल जाए। भारत की सनातन संस्कृति में मध्यस्थ का फार्मूला त्रेता युग से चला आ रहा है। कौरव और पांडवों के बीच महाभारत को टालने के लिए भगवान कृष्ण ने स्वयं मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

 

 

 

 

भगवान के सारे प्रस्ताव कौरवों ने अस्वीकार कर दिए, तब अंत में भगवान कृष्ण ने मात्र पांच गांवों का प्रस्ताव रखा ताकि पांचों पांडव अपना गुजर बसर कर सके। असल में भगवान कृष्ण को संभावित युद्ध के परिणाम की जानकारी थी, इसलिए उन्होंने स्वयं मध्यस्थ की भूमिका निभाई। भगवान की मध्यस्थता के बाद भी कौरव और पांडवों के बीच युद्ध हुआ और परिणाम सबके सामने है। तब कहा गया कि यह धर्म और अधर्म के बीच है। धर्म यानि सत्य, सत्य यानि भगवान का साथ।

 

 

 

 

पांडवों के साथ कृष्ण स्वयं रहे, इसलिए कौरवों की हार हुई, लेकिन नुकसान पांडवों का भी हुआ। हालांकि अब न तो कौरव है और न पांडव और न ही भगवान श्रीकृष्ण। लेकिन इतिहास गवाह है कि भगवान के मध्यस्थ बनने के बाद भी महाभारत का युद्ध हुआ। हालांकि धर्म के आधार पर 1947 में भारत का विभाजन हो चुका है। मोहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के अमन चैन के लिए पाकिस्तान मांगा और उन्हें मिल भी गया। तब उनके मध्यस्थतों ने देश के विभाजन का विरोध किया, लेकिन मुसलमानों के लिए अलग देश बनाया ही गया।

 

 

 

 

 

इसे दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा कि धर्म के आधार पर पाकिस्तान बन जाने के बाद भी आजादी के बाद से ही देानों देशों के बीच दुश्मनी बनी हुई है और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मामला भी भारत में विवाद का कारण बन गया है। जब एक बार महाभारत कर देश का विभाजन हो गया तो फिर अब दूसरे महाभारत की क्या जरुरत हैं? ऐसा नहीं कि भारत में रहने वाले सभी मुसलमान भगवान राम के मंदिर के खिलाफ हैं। अनेक मुस्लिम संगठनों खास कर शिया वक्फ बोर्ड ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने पर सहमति दी है। बोर्ड ने यहां तक कहा है कि बाबरी मस्जिद के लिए बोर्ड लखनऊ में अपनी भूमि देने को तैयार है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब जब सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थ का फार्मूला रख दिया है तो कोई सम्मानजनक हल निकलना चाहिए

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