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सुरमा

पर्दे पर उतरी सुरमा शानदार स्टोरी के साथ

फिल्म की कहानी-  पर्दे पर उतरी सुरमा शानदार स्टोरी के साथ इस कहानी की सूत्रधार है हरप्रीत यानि ताप्सी पन्नू जो कि फिल्म में संदीप सिंह यानि दिलजीत दोसांझ का प्यार है। वो प्यार जिसके लिए ही संदीप सिंह हाथों में हॉकी थामता है, नेशनल प्लेयर बनता है, बड़ी नौकरी पाता है , पूरे पिंड का नाम रौशन करता है। लेकिन हरप्रीत तो चाहती है कि वो यहीं न रुके वो तो वर्ल्ड कप खेले।  वर्ल्ड कप के लिए संदीप सिंह ट्रेन में सवार तो होता है लेकिन फिर 22 अगस्त 2006 का वो सफ़र कैसे उसकी ही नहीं बल्कि उससे जुड़े हर शख्स की जिन्दगी 360 डिग्री बदल कर रख देता है ये कहानी है

 

 

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सूरमा की। वाकई ये एक ऐसे सूरमा की कहानी है जिसने जहन्नुम से भी बदतर हो जाने वाली अपनी जिन्दगी को वो रौशनी दे दी जिसे देख आपको भी प्रेरणा मिलेगी। शाद अली, शिव अनंत और सुयश त्रिवेदी का स्क्रीनप्ले बहुत कम सिनेमाई आज़ादी लेते हुए वो कहानी परदे पर पेश करता है जिस पर आपको यकीन हो। यहां तक कि पंजाब के गांव शाहबाद के माहौल से लेकर हॉकी के वर्ल़्ड टूर्नामेंट्स तक सभी को रियलिटी की हद तक फिल्माया गया है। फिल्म का फर्स्ट हाफ़ थोड़ा हल्का है मगर दूुसरे हिस्से ने उसकी भरपाई की । ये अच्छे इरादे से बनायी गयी बेहतरीन कहानी है।

 

 


एक्टिंग-
  फिल्म में एक्टिंग की बात बाद में करेंगे मगर सबसे पहले ये कह दूं कि किरदार ऐसे हैं कि सभी से प्यार हो जाये। इस फिल्म की कास्टिंग साल की सबसे लाजवाब कास्टिंग में गिनी जानी चाहिए। संदीप सिंह के रोल में दिलजीत दोसांझ ने फिजिकली ही नहीं बल्कि मन से भी संदीप सिंह को साकार कर दिया है। वो एक गिफ्टेड एक्टर हैं मैं कहूंगा क्योंकि उनकी एक्टिंग में एक अच्छाई नज़र आती है, किसी तरह का नकलीपन नहीं दिखता ।

 

 

 

 

उनके बाद जिस कलाकार ने दिल जीत लिया वो हैं अंगद बेदी जो कि दिलजीत के भाई के रोल में हैं, अंगद ने साबित किया है कि वो लंबी रेस के घोड़े हैं। ताप्सी पन्नू फिल्म का जज्बाती पहलु हैं जिनकी मौजूदगी फिल्म को मजबूती देती है। दिलजीत के पिता जी के किरदार में सतीश कौशिक, कोच के रोल में विजय राज और हॉकी फॆेडरेशन के चेयरमैेन के रोल में कुलभूषण खरबंदा छोटे मगर याद रह जाने वाले रोल में है

 

 

 

डायरेक्शन- म्यूज़िक और तकनीक- डायरेक्टर शाद अली माहिर निर्देशक हैं, साथिया, बंटी और बब्ली, किल दिल के अलावा ओके जानू में आप उनका सिग्नेचर देख चुके हैं लेकिन, सूरमा उन्हें स्थापित करेगी। वो कहानी को कहने में सिनेमाई आज़ादी नहीं लेते इसलिए ही सूरमा सच्ची लगती है फिल्मी नहीं। शंकर एहसान लॉय का संगीत और बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म से जुड़़ने में काफी काम आता है। सारे गाने फिल्म को भावनात्मक स्तर पर ऊपर उठाते हैं। सिनेमैटोग्राफी से लेकर आर्ट डायरेक्शन, या फिर सेटअप सभी बेहतरीन हैं। फिल्म बस पहले हाफ़ में कमज़ोर लगी खासतौर पर संदीप सिंह के साथ दर्दनाक हादसे वाले इंटरवल सीन में दम नहीं था। मगर पूरी फिल्म जबरदस्त है।

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