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Tag Archives: मंशा नाटक

‘पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही नहीं’..

“तुम एस्ट्रोनॉट बनकर क्या करोगी. औरतें एस्ट्रोनॉट नहीं बनतीं. तुम हवा में उड़ती फिरोगी तो पति के लिए खाना कौन बनाएगा” कहने को तो ये लंदन में हुए नाटक ‘बुर्क़ ऑफ़’ की शुरुआती लाइनें हैं लेकिन बहुत से परिवारों की शायद यही हक़ीक़त है. कम से कम नादिया मंज़ूर की ज़िंदगी की असलियत तो यही है.. असल ज़िंदगी पर आधारित ...

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