पुलिस की चापलूसी और खुद की जेबें भरने से नहीं चूकते वाट्सएपिया पत्रकार.

 

पुलिस की चापलूसी और खुद की जेबें भरने के लिए कुछ वाट्सएपिया पत्रकार तोड़ रहे चाटुकारिता की हदें,डिमाण्ड पूरी न होने पर सोशल मीडिया पर निकालने लगते हैं अपनी भड़ास,आबकारी विभाग निघासन इसका भुक्तभोगी|

विकास दीछित “अटल”

निघासन (खीरी)
हर तहसील और हर शहर से अलग दिखती है निघासन की पत्रकारिता।यहां कोई पत्रकार अगर कुछ पुलिस कर्मियों की कार्यशैली के सम्बंध में सोशल मीडिया पर ख़बर वाइरल कर दे तो जिस पुलिसकर्मी के सम्बन्ध में ख़बर चली हो वह कम और उसके मुंहलगे ख़बर को पढ़कर एकदम से बौखला जाते है और अपनी झूठी अहमियत को दिखाने के लिए इस डिजिटल भारत की डिजिटल सर्विस वॉट्सएप पर  अपने को अत्यधिक सगा सम्बन्धी मानकर उस पत्रकार की खिलाफत करने पर बेझिझक कलम की ताकत को झोंक देते हैं। ऐसे कुछ पत्रकारों को उन पुलिसकर्मियों से अटके हुए मामलों में गरीबों से अच्छा खासा लेनदेन कराकर उन खाऊ कमाऊ पुलिसकर्मियों की जेब भरते है और खुद भी उन्हीं के सहारे अपना भी  खर्चा पानी चलाते हैं।

इसी तरह के उदाहरण हमेशा सोशल मीडिया पर कुछ पत्रकारों द्वारा आपसी मतभेद चला करता है बल्कि सोशल मीडिया पर देखा जाए तो चाटुकार कुछ वाट्सएपिया पत्रकार एक दरोगा के पक्ष में हर छोटी बड़ी ख़बर इस तरह कवरेज करते है कि मक्खनबाजी की सारी हदें ही पार कर देते हैं। लेकिन वह पत्रकार भाई यह भूल जाते है की चाटुकारिता की भी कोई हद होती है और उन्हें जनपद के सभी उच्च अधिकारी व समझदार लोग इनकी चिकनी चुपड़ी चाटुकारिता वाली पोस्ट को पढ़कर पत्रकार की अहमियत को भी भलीभांति जानते और समझते है।अगर कोई विभाग उनकी रोज रोज की नाजायज सिफारिशों को नहीं मानता है तो उसके खिलाफ वाट्सऐप पर आग उगलने लगते हैं।एक वाट्स एपिया पत्रकार द्वारा आये दिन निघासन के आबकारी विभाग के खिलाफ वाट्सऐप पर अपनी भड़ास निकालना इसका जीता जागता उदाहरण है।कोई इनके सामने भले न कहे,लेकिन इनके कृत्यों के बारे में बच्चा-बच्चा जानता है।बाप बड़ा न भैया,सबसे बड़ा रुपइया।पैसा मिले,चाहे जैसे मिले।

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