नीतिश कुमार की राह नहीं आसान!

कृष्णमोहन झा

बिहार में राजग के एक घटक जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के  ने हाल में ही जब  मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब उन्हें यह गर्वानुभूति अवश्य हुई होगी कि वे देश के किसी राज्य में सर्वाधिक सात बार मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने का रिकार्ड बनाने जा रहे हैं परंतु नीतिश कुमार को यह अनुमान निश्चित रूप से नहीं रहा होगा कि शीघ्र ही उनकी सरकार के साथ प्रथम ग्रासे मक्षिका पात: कहावत भी चरितार्थ होने जा रही है। सत्ता की राजनीति के चतुर खिलाड़ी नीतिश कुमार ऐसा सोच भी कैसे सकते थे कि उन्हें अपनी सरकार के नवनियुक्त शिक्षा मंत्री को उनके पदभार ग्रहण करने के मात्र दो घंटे के अंदर ही भ्रष्टाचार के कथित आरोपों के कारण मंत्रिपद से इस्तीफा देने का निर्देश देने के लिए विवश होना पड़ेगा। यह भी शायद अपने आप में एक  रिकार्ड है कि जदयू के नवनिर्वाचित विधायक डॉ मेवालाल चौधरी ने 16 नवंबर को मंत्रिपद की शपथ ली,19 नवंबर को राज्य के शिक्षा मंत्री का पदभार ग्रहण किया और मात्र एक घंटे के अंदर ही मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने उन्हें अपने कार्यालय में बुलाकर उनसे दो दो टूक शब्दों में तत्काल मंत्रिपद छोड़ने के लिए कह दिया। मेवालाल चौधरी पर अतीत में राज्य के एक कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए थे वे इतने गंभीर प्रकृति के थे कि नीतिश कुमार उनको कोई सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने में खुद को असमर्थ पा रहे थे इसलिए उन्हें मनमसोस कर यह फैसला करना कि मेवालाल चौधरी से तत्काल मंत्रिपद वापस ले लिया जाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर नीतिश कुमार के लिए अपनी सरकार के शिक्षा मंत्री का  बचाव करना संभव होता तो वे अपनी सरकार की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाला यह अप्रिय फैसला की हर संभव कोशिश करते परंतु अपनी स्वयं की प्रतिष्ठा बचाने के लिए उन्होंने एक फैसला करना ही उचित समझा जिसे विपक्ष अपनी जीत बता रहा है। नीतिश कुमार ने  भ्रष्टाचार के आरोपी एक मंत्री को तत्काल अपनी सरकार से हटाकर एक रिकार्ड बनाया हो परंतु इस फैसले के लिए वे किसी तारीफ के हकदार नहीं हैं बल्कि उन्हें तो अब इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि क्या मेवालाल चौधरी को अपनी सरकार में शामिल करते समय यह जानकारी नहीं थी कि अतीत में कुलपति के रूप में उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के ऐसे गंभीर आरोप लगाए जा चुके हैं जिनसे वे अभी तक बरी नहीं हुए हैं। नीतिश कुमार निसंदेह अब असहज स्थिति का सामना कर रहे होंगे परंतु मुख्यमंत्री के रूप में उनके इस कार्यकाल की शुरुआत जिस तरह हुई है उससे तो यही संकेत मिल रहे हैं कि उनका यह कार्य काल निरापद नहीं होगा।

हाल में ही संपन्न राज्य विधानसभा सभा चुनावों में जदयू को भाजपा से काफी कम सीटें मिलने के बावजूद भाजपा ने उनके अनुभव और वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए उन्हें मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने का अधिकार प्रदान कर दिया था । नीतिश कुमार जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उनके साथ  ही जदयू के 5,भाजपा के 7, और हम तथा वीआईपी के एक एक विधायकों को भी  मंत्रिपद की शपथ दिलाई गई थी  । जदयू के 5 मंत्रियों में सबौर  कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति मेवालाल चौधरी भी शामिल थे परंतु जिस दिन मेवालाल चौधरी मंत्री बने उसी दिन से प्रमुख विपक्षी दल राजद ने नीतिश कुमार को चौधरी के विरुद्ध लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की याद दिलाते हुए एक अभियान छेड़ दिया । आश्चर्य की बात तो यह थी कि मुख्यमंत्री ने इन आरोपों की अनदेखी करते हुए हुए उन्हें शिक्षा मंत्रालय  का कार्यभार सौंप दिया परंतु नीतिश कुमार अपने इस फैसले का औचित्य सिद्ध नहीं कर सके और शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी से तत्काल मंत्रिपद वापस लेना उनकी मजबूरी बन गया ।गौरतलब है कि नीतिश सरकार से बेआबरू होकर विदा लेने वाले मेवालाल चौधरी जब सबौर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति थे तब उन पर असिस्टेंट प्रोफेसर और जूनियर वैज्ञानिक के पदों पर नियुक्तियों में भ्रष्टाचार तथा भवन निर्माण में घोटाले के आरोप लगे थे इसके अतिरिक्त उनकी पत्नी की मृत्यु में भी कथित रुप से उनका हाथ होने का आरोप है।

मेवालाल चौधरी की पत्नी भी राजनीति में सक्रिय थीं और वे भी 2015के विधान सभा चुनाव में जदयू की टिकट पर विधायक चुनी गई थीं। 2017 में गैस सिलेंडर से हुई अग्नि  दुर्घटना में उनकी मौत के समय भी मेवालाल चौधरी शक के घेरे में आ गए थे। कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहते हुए नियुक्तियों में भ्रष्टाचार और भवन निर्माण में घोटाले के आरोपों के उन्हें पार्टी ने हाशिए पर धकेल दिया था। नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के मामले में उन पर  एफआईआर भी दर्ज की गई और तब मेवालाल चौधरी ने गिरफ्तारी के डर से अदालत से अंतरिम जमानत ले ली थी।मात्र चार दिन में  नीतिश सरकार से विदाई के बाद मेवालाल चौधरी कहते हैं कि उनके विरुद्ध अदालत में मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है और वे पूरी तरह निर्दोष हैं । सवाल यह उठता है कि अगर वे निर्दोष हैं तो उन्हें इस तरह बेआबरू होकर नीतिश सरकार से कर्मों हटना पड़ा।  सबसे बड़ा सवाल यह है कि नीतिश कुमार ने अतीत में उन पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद उन्हें विधानसभा चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार कर्मों बनाया। इतना ही नहीं बाद में अपनी सरकार में मंत्री पद से भी नवाज दिया।

इस पूरे प्रकरण ने मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को बचाव की मुद्रा में ला दिया है। राजद के नेता तेजस्वी यादव नीतिश सरकार से  शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी की विदाई को अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं तो यह कतई आश्चर्य की बात नहीं है। आखिर  यह मनचाहा अवसर तो उन्हें नीतिश कुमार ने ही उपलब्ध कराया है।

ऐसा प्रतीत होता है कि नीतिश कुमार इस बार फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं। शायद  मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की कटु स्मृतियां अभी तक उनके मस्तिष्क में ताज़ा हैं जब उनकी सरकार में संबंधित विभाग की मंत्री मंजू वर्मा का वे काफी समय तक बचाव करते रहे परंतु अंत में उन्हें मंजू वर्मा को अपनी सरकार से हटाने पर विवश होना पड़ा लेकिन तब तक सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी थी।

कुल मिलाकर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नीतिश कुमार के लिए यह कार्य काल निरापद न होने के संकेत अभी से मिलने लगे हैं। विधानसभा में जदयू से भाजपा की सीटें ज्यादा होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद भरे ही उन्हें मिल गया हो परंतु भाजपा को दो उपमुख्यमंत्री पद और विधानसभा सभा अध्यक्ष पद देने के लिए उन्हें जिस तरह विवश होना पड़ा है उससे यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि उन्हें इस कार्यकाल में कितने समझौते करना पड़ेंगे।

 

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