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नारी में शक्ति है , महिला सशक्तिकरण एक धारणा

सशक्तिकरण की आवश्यकता सदियों से महिलाओं का पुरुषों द्वारा किए गए शोषण और भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए हुई; महिलाओं की आवाज़ को हर तरीके से दबाया जाता है। महिलाएं विभिन्न प्रकार की हिंसा और दुनिया भर में पुरुषों द्वारा किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहारों का लक्ष्य हैं। भारत भी अछूता नहीं है। भारत एक जटिल देश है। यहाँ सदियों से विभिन्न प्रकार की रीति-रिवाजों, परंपराओं और प्रथाओं का विकास हुआ है। ये रीति-रिवाज और परंपराएं, कुछ अच्छी और कुछ बुरी, हमारे समाज की सामूहिक चेतना का एक हिस्सा बन गई हैं। हम महिलाओं को देवी मान उनकी पूजा करते हैं; हम अपनी मां, बेटियों, बहनों, पत्नियों और अन्य महिला रिश्तेदारों या दोस्तों को भी बहुत महत्व देते हैं लेकिन साथ ही भारतीय अपने घरों के अंदर और अपने घरों के बाहर महिलाओं से किए बुरे व्यवहार के लिए भी प्रसिद्ध हैं।

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हर धर्म हमें महिलाओं के सम्मान और शिष्टता के साथ व्यवहार करना सिखाता है। आज के आधुनिक में समाज की सोच इतनी विकसित हो गई है कि महिलाओं के खिलाफ शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की कुरीतियाँ और प्रथाएँ आदर्श बन गई हैं। जैसे सतीप्रथा, दहेज प्रथा, परदा प्रथा, भ्रूण हत्या, पत्नी को जलाना, यौन हिंसा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और अन्य विभिन्न प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार; ऐसे सभी कार्यों में शारीरिक और मानसिक तत्व शामिल होते हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध या अत्याचार अभी भी बढ़ रहे हैं। इनसे निपटने के लिए समाज में पुरानी सोच वाले लोगों के मन को सामाजिक योजनाओं और संवेदीकरण कार्यक्रमों के माध्यम से बदलना होगा इसलिए महिला सशक्तिकरण की सोच न केवल महिलाओं की ताकत और कौशल को उनके दुखदायी स्थिति से ऊपर उठाने पर केंद्रित करती है बल्कि साथ ही यह पुरुषों को महिलाओं के संबंध में शिक्षित करने और महिलाओं के प्रति बराबरी के साथ सम्मान और कर्तव्य की भावना पैदा करने की आवश्यकता पर जोर देती है।

 

प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक महिला की स्थिति-सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से समान नहीं रही है। महिलाओं के हालातों में कई बार बदलाव हुए हैं। प्राचीन भारत में महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा प्राप्त था; शुरुआती वैदिक काल में वे बहुत ही शिक्षित थी। हमारे प्राचीन ग्रंथों में मैत्रयी जैसी महिला संतों के उदहारण भी हैं। सभी प्रकार की भेदभावपूर्ण प्रथाएँ बाल विवाह, देवदासी प्रणाली, नगर वधु, सती प्रथा आदि से शुरू हुई हैं। महिलाओं के सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों को कम कर दिया गया और इससे वे परिवार के पुरुष सदस्यों पर पूरी तरह से निर्भर हो गई। शिक्षा के अधिकार, काम करने के अधिकार और खुद के लिए फैसला करने के अधिकार उनसे छीन लिए गए। मध्ययुगीन काल के दौरान भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ महिलाओं की हालत और भी खराब हुई। ब्रिटिश काल के दौरान भी कुछ ऐसा ही था लेकिन ब्रिटिश शासन अपने साथ पश्चिमी विचार भी देश में लेकर आया।

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जा राम मोहन रॉय जैसे कुछ प्रबुद्ध भारतीयों ने महिलाओं के खिलाफ प्रचलित भेदभाव संबंधी प्रथाओं पर सवाल खड़ा किया। अपने निरंतर प्रयासों के माध्यम से ब्रिटिशों को सती-प्रथा को समाप्त करने के लिए मजबूर किया गया। इसी तरह ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, आचार्य विनोबा भावे आदि जैसे कई अन्य सामाजिक सुधारक ने भारत में महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया। उदाहरण के लिए 1856 के विधवा पुनर्विवाह अधिनियम विधवाओं की शर्तों में सुधार ईश्वर चंद्र विद्यासागर के आंदोलन का परिणाम था।स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष के लगभग सभी नेताओं का मानना ​​था कि स्वतंत्र भारत में महिलाओं को समान दर्जा दिया जाना चाहिए और

 

सभी प्रकार की भेदभावपूर्ण प्रथाओं को रोका जाना चाहिए और ऐसा होने के लिए भारत के संविधान में ऐसे प्रावधानों को शामिल करना सबसे उपयुक्त माना जाता था जो पुरानी शोषण प्रथाओं और परंपराओं को दूर करने में सहायता करेगा और ऐसे प्रावधान भी करेगा जो महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने में मदद करेंगे।महिलाओ में अपने अधिकारों के प्रतिजागरूकता लेन के लिए महीने में  एक बार क़ानूनी परामर्श शिविर का आयोजन करना ताकि महिलाये अपने अधिकारों से अवगत हो सके। इस शिविर में सामाजिक कार्यकर्ता,वरिष्ठ अधिवक्ता n g o से सदस्यों और कार्यक्रम संरक्षक का सहयोग लिया जाना अपेक्षित रहेगा।

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कार्यक्रम को प्रभावी बनाने के तरीके।

कार्र्यक्रम को सम्पन करवाने के लिए क़ानूनी और महिला अधिकारों से सम्बंधित संस्थाओ और सदस्यों से सेजुड़ाव ताकि उनके सहयोग से  कार्यक्रम को सार्थक और उपयोगी बनाकर महिलाओ के हितो के लिए बेहतर परिणाम प्राप्त किया जा सके। क्रायक्रम को प्रभावी बनाने के के लिए सेमीनार अवेयरनेस कैंप ,पोस्टर और बैनर के जरिये सोशल मीडिया और अन्य जगहों पर प्रचार करना ,समाचारो के जरिये महिलाओ से सम्बंधित सभी अधिकारों को लोगो तक पहुँचाना। जनजागृति लाना। कामकाजी महिलाओ के द्वारा उनका प्रचार प्रसार करना। नाटक संगीत के माधयम से भी प्रचार करना।
 संस्थाओ से जुड़ाव —
-माहिलाओ के अधिकारों के लिए क़ानूनी परामर्श और जागरूकता कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए इन संस्थाओ का सहयोग अपेक्षित रहेगा।
महिला आयोग
महिला थाना
महिला हेल्प लाइन
महिलाओ को सामाजिक आर्थिक और शिक्षा की दरहति से सशक्त बनाने पर जोर दिया जायेगा जो महिलाए हिंसा  और शोषण का शिकार हैं उन्हें पुनर्स्थापित किया जायेगा। उनके अंदर से योग्यताए तलाशना ताकि वो अपनी क्षमताओं को जानकर अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयं ले सके।
 लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण दोनों ही विकास और उच्च आर्थिक स्थिति को प्राप्त करने के लिए बदलाव ही महत्वपूर्ण रणनीति है।
                                                                                                                                                                                                                    सोनाली  त्रिवेदी

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