अफसरों की लापरवाही के शिकार हो रहे बेजुबान बच्चे

बुलंदशहर बेसिक शिक्षा विभाग ने मूक-बधिर बच्चों के साथ एक अजीब-सा धोखा किया है. विभाग ने उस इमारत में प्राइमरी स्कूलों की किताबों की खेप भर दी, जहां पिछले कई वर्षों से इन बच्चों के लिए इन्ट्रीग्रेशन कैंप चलता था. इन कैम्पस में जिले के मूक-बधिर बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए 10 महीने पढ़ने-लिखने की ट्रेनिंग दी जाती है.

आंखों के इशारे और सामने वाले चेहरो को पढ़कर जिंदगी जीने वाले इन मूक-बधिर बच्चों की दुनियां में आवाज नही होती. वह बोल नहीं सकते. सुन नही सकते और कुछ ऐसे भी है जो देख नही सकते. प्रदेश सरकार ने ऐसे बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जिला मुख्यालय पर दो कैम्पस का प्रावधान रखा है. इन कैम्पस में बच्चों को अक्षरों का उच्चारण समझने, इशारों को समझने और ब्रेनलिपि से पढ़ने की ट्रेनिंग दी जाती है.

लेकिन बुलंदशहर बेसिक शिक्षा विभाग के लापरवाह अफसरों ने इस साल इन बच्चों के अधिकार के साथ धोखा कर दिया. बुलंदशहर सिटी के समाज कल्याण होस्टल में लगने वाला इन्ट्रीग्रेशन कैंप इस साल नही लगाया गया. इस इमारत में बेसिक शिक्षा विभाग ने प्राइमरी स्कूलो में बांटने वाली किताबों की खेप भर दी गयी है.

10 महीने के लिए चलने वाला यह कैंप 1 जुलाई से शुरू होना चाहिए था. लेकिन बेसिक शिक्षा अधिकारी चैन की नींद सोते रहे और मूक-बधिर बच्चे और उनके परिजन दाखिले के लिए भटकते रहे. अक्टूबर में जाकर बीएसए साहब ने सिविल लाइंस स्कूल में लगने वाले एक कैंप की शुरूआत करा दी. लेकिन दूसरे कैंप के लिए बिल्डिंग ही विभाग के पास नही है. इस कैंप के वार्डन औऱ स्टाफ चयन होने के बाद से मुफ्त की तनख्वाह मार रहे हैं और दिव्यांग बच्चों के मां-बाप उनके दाखिले के लिए परेशान है.

जिले के 120 बच्चे इन दोनों कैम्पस के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं. जिलाधिकारी बुलंदशहर से जब इस बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने बीएसए के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है.

जिले के 60 से ज्यादा मूक-बधिर बच्चे इस वर्ष प्राइमरी स्कूलों का मुंह नहीं देख पाएंगे. तादात तो ऐसे बच्चो की और भी ज्यादा है, मगर सरकार के कागजों में केवल इतने ही बच्चों को पढ़ाने का इंतजाम है. इन बच्चों के लिए जिले में भेजा गया सरकारी बजट तो अफसर इस साल भी ठिकाने लगा देगे, लेकिन जिन मासूमों का इस रकम पर हक था, उसका लाभ उन्हें नहीं मिलेगा. सवाल यह है कि इन बच्चों को पढ़ाई से महरूम रखने की जवाबदेही आखिर किसकी होगी.

 

 

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