हो सकता है भविष्य में यह विलुप्त बूटी इंसान को फिर से मिल जाए?

हमेशा युवा बने रहने की ख्वाहिश हर इंसान की होती है। यह ख्वाहिश शायद पूरी भी हो सकती थी। क्योंकि धोसी पहाड़ी पर कभी ‘कायाकल्प’ बूटी जिंदा थी । अब ये बूटी यहां मौजूद है या नहीं इस पर शोध जारी है। हो सकता है भविष्य में यह विलुप्त बूटी इंसान को फिर से मिल जाए?

दरअसल धोसी पहाड़ी हरियाणा से राजस्थान के मरुभूमि तक फैली हुई पहाड़ी है। यह पहाड़ी अरावली पर्वत श्रृंखला का एक भाग है। आधुनिक शोध बताते हैं कि इन पहाड़ियों में आयुर्वेदिक औषधियां बहुत मात्रा में उपलब्ध हैं।

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यहां मौजूद ‘कायाकल्प’ एक ऐसी औषधि थी? जिसे अच्छी त्वचा और स्वास्थ्य के लिए तैयार किया गया था और इस तरह कायाकल्प का निर्माण भी सदियों पहले धोसी पहाड़ी पर ही किया जाता होगा?

यहां मौजूद है सुप्त ज्वालामुखी

अरावली पर्वत श्रृंखला के अंतिम छोर पर उत्तर-पश्चिमी हिस्से में एक सुप्त ज्वालामुखी है, जिसे धोसी पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। इस पहाड़ी का उल्लेख विभिन्न धार्मिक पुस्तकों में भी मिलता है जैसे महाभारत, पुराण आदि।

यह थी च्यवनप्राश की जन्मभूमि

च्यवनप्राश और शंखपुष्पी जैसे उत्पाद की जन्मभूमि धोसी पहाड़ी ही है। यह पहाड़ी सदियों से यहां मौजूद है। पहाड़ी की तलहटी में धुंसरा गांव मौजूद है। इतिहासकारों का मानना है कि धुंसरा गांव के लोग वैश्य और ब्राह्मण हैं, जो कि च्यवन और भृगु ऋषि के वंशज हैं।

पहाड़ी पर क्यों बनाया गया किला

सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य जिन्हें हेमू (1501-1556) एक हिन्दू राजा था, जिसने मध्यकाल में 16वीं शताब्दी में भारत पर राज किया था। हेमचंद्र विक्रमादित्य राजा को धोसी पहाड़ी की महानता का अहसास था।

यही कारण रहा होगा कि उसने धोसी पहाड़ी के आयुर्वेद तत्वों को सुरक्षित रखने के लिए धोसी पहाड़ी के ऊपर एक किले का निर्माण किया था। भारतीय इतिहास के स्वर्णक्षरों में अंकित है कि हेमू को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा गया है।

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