प्रकृति के इस चहेते को गूगल का सलाम

धनबाद.  हां, तब पश्चिमी दुनिया की नजर में हिन्दुस्तान जादू-टोनों का देश था…और निश्चय ही जगदीश चंद्र बोस पूरब की दुनिया के जादूगर थे। यह सम्मान बख्शा था उन्हें पश्चिमी विज्ञान जगत ने उनकी विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा की बदौलत। सर्च इंजन गूगल ने भी 30 नवंबर को सर जगदीश चंद्र बोस के 158वें जन्मदिन पर गूगल डूडल पर स्थान देकर उनके प्रति कृतज्ञता अर्पित की।
…तोहमत झेली फिर लड़कर हासिल किया सम्मान
30 नवंबर 1858 को ( अब के बांग्लादेश ) मैमन सिंह जिले के फरीदपुर गांव में जन्मे सर जेसी बोस के पिता भगवान चंद्र बोस तब फरीदपुर में ही अंग्रेजों के मुलाजिम के तौर पर डिप्टी मजिस्ट्रेट हुआ करते थे। बोस की शुरुआती पढ़ाई यहीं से हुई। भौतिकी व जीव विज्ञान में उनकी रुचि थी। आगे की पढ़ाई के लिए कलकत्ता यूनिवर्सिटी, कैंब्रिज और लंदन गए। लौटकर उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में फिजिक्स के प्रोफेसर के तौर पर सेवा देनी शुरू की। इस दौरान उन्हें अंग्रेजों की उपेक्षा से आधी सैलरी मिलती थी। इस बात पर उन्होंने एतराज जताते हुए तकरीबन तीन साल तक बगैर सैलरी के नौकरी की। बाद में अंग्रेजी हुकूमत को झुकना पड़ा और उन्हें ससम्मान बराबरी का हक मिला।

यों तो बोस को बचपन के दिनों से ही प्रकृति से प्रेम था। प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य उन्हें हमेशा ही लुभाता था। प्रकृति प्रेम में वशीभूत होकर वे अपने अंतिम दिनों में गिरिडीह चले आए। यहां उन्होंने 1907 में अमृत नाथ मिश्रा से एक बंगला खरीदा था। यहीं 13 नवंबर 1937 को बाथरूम में गिरकर उनका आकस्मिक निधन हो गया था। यहां उनकी स्मृति अब स्मारक और विज्ञान केंद्र के रूप संरक्षित है।
जो मिले सम्मान…
फिजिक्स, बायोफिजिक्स, बायोलॉजी, आरकियोलॉजी के मर्मज्ञ और बंगाली लिट्रेचर समेत बंगाली साइंस फिक्स के जनक बोस को 1911 में स्टार ऑफ इंडिया और 1917 में नाइट समेत कई सम्मानों से नवाजा गया। कविगुरु रवींद्रनाथ ने जहां बोस के सम्मान में कविताएं लिखीं, वहीं बोस ने कविगुरु की रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी में किया।

‘जगदीश चंद्र बोस की गिरिडीह से जुड़ी स्मृतियों के संरक्षण का प्रयास प्रशासन स्तर पर किया जा रहा है।
इस बारे में सरकार को भी लिखा गया है। यहां उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए स्थानीय लोग हमेशा प्रयासरत रहे हैं। इसे और भी सघन किया जाएगा। खासकर नई पीढ़ी के लिए उनके जीवन से परिचित होना बहुत महत्वपूर्ण है। विज्ञान की वैश्विक दुनिया में जिन झंझावातों को सहते हुए सर जेसी बोस ने भारत का परचम लहराया, वह अनुकरणीय है। हमारी कोशिश होगी कि बच्चों के बीच उनका जीवन-संदेश जाए- उमाशंकर सिंह, उपायुक्त, गिरिडीह।

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