कड़वी हकीकत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो कड़वी हकीकत एक साथ स्वीकार की है। सोमवार को विज्ञान भवन में आयोजित दिल्ली उच्च न्यायालय के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर बोझ कम करने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज है। न्यायपालिका का काफी समय ऐसे मामलों की सुनवाई में जाता है जिनमें सरकार एक पक्ष होती है। अब देखना यह है कि यह स्वीकारोक्ति महज एक अवसरोचित और औपचारिक बयान होकर रह जाएगी, या न्यायिक सुधार की दिशा में सरकार खुद से की जाने वाली उम्मीदों को पूरा करने की दिशा में कुछ ठोस पहल भी करेगी। राजग सरकार ने अभी तक एक ही सराहनीय कदम उठाया है। उसने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बने कई पुराने और दशकों से अप्रचलित रहे कानूनों की विदाई कर दी, जिनका वजूद सिर्फ कानून की पुरानी किताबों में था।

लेकिन ऐसे बहुत-से काम बाकी हैं जो कार्यपालिका के सहयोग के बगैर पूरे नहीं हो सकते। इनमें सबसे अहम मसला है न्यायतंत्र के पूरी क्षमता से काम करने और उसकी क्षमता बढ़ाने के सिलसिले में आने वाली अड़चनों का। यह किसी से छिपा नहीं है कि हर स्तर पर जजों के बहुत सारे पद खाली हैं। कोलेजियम की सिफारिश के बाद भी पद खाली रहें, तो सरकार अपनी जवाबदेही से पल्ला कैसे झाड़ सकती है? विधि आयोग काफी समय से यह सलाह देता आया है कि जजों की तादाद बढ़ाई जानी चाहिए। पर पदों की संख्या में वृद्धि की कौन कहे, बहुत सारे स्वीकृत पद भी खाली रहते हैं। यही नहीं, कई सारे न्यायाधिकरणों की भी यही दशा है। जबकि देश भर में लंबित मामलों की कुल तादाद तीन करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है। रिक्त पदों को भरना, न्यायिक पदों की संख्या बढ़ाना और अदालती कार्य-संस्कृति में सुधार, ये तीन अहम शर्तें हैं न्याय-तंत्र की क्षमता-वृद्धि के लिए। पर इसके अलावा, अदालतों को मुकदमों के बोझ से राहत दिलाने के लिए प्रशासनिक सुधार भी एक अहम तकाजा है।

ध्यान रहे, काफी सारे मुकदमे प्रशासन में निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता की कमी से पैदा होते हैं। बहुत-से लोग प्रशासन या सरकार से न्याय न मिल पाने के बाद अदालत की शरण में जाते हैं, जहां उन्हें तारीख पर तारीख मिलती है और बरसों चक्कर काटने पड़ते हैं। इसी तरह, ढेर सारे मुकदमे जमीन के रिकार्ड दुरुस्त न होने की वजह से पैदा होते हैं। सरकार का रुख भी मुदकमों का बोझ बढ़ते जाने के पीछे एक बड़ा कारण है। जैसा कि खुद प्रधानमंत्री ने उदाहरण दिया, अगर एक शिक्षक सेवा से जुड़े किसी मामले में अदालत की शरण में जाता है और उसे जीत हासिल होती है, तो ऐसे न्यायिक आदेश को आधार बनाया जाना चाहिए ताकि इसका फायदा मिल सके और बाद के स्तर पर हजारों की संख्या में मुकदमों को कम किया जा सके।

लेकिन होता यह रहा है कि सरकार अमूमन उस न्यायिक आदेश के खिलाफ अपील कर देती है। आपराधिक मामलों की विडंबना इसी से समझी जा सकती है कि जेलों में जितने लोग बंद हैं उनमें दो तिहाई विचाराधीन कैदी हैं। फिर, विचाराधीन कैदियों में ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने खिलाफ चल रहे अभियोग की संभावित अधिकतम सजा से ज्यादा समय से जेल में सड़ते रहते हैं। ऐसे मामलों की छानबीन कर आपराधिक मामलों को एक झटके में कम किया जा सकता है। जाहिर है, उपाय कई हैं। असल समस्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की रही है।

 

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