भारत अपनी क्षमता के अनुसार नहीं कर रहा है ग्रोथ

नई दिल्ली। भारतीय इकोनॉमी कई सारे चैलेंज का सामना कर रही है। जिसकी वजह से सरकार के स्तर से लेकर इंडस्ट्री के स्तर पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही भारत अपनी क्षमता के अनुसार ग्रोथ कर पाएगा, साथ ही नई नौकरियों के भी अवसर पैदा होंगे। यह बातें एचडीएफसी बैंक चीफ इकोनॉमिस्ट अभीक बरुआ ने कही है। बरुआ ने इकोनॉमी, प्राइवेट सेक्टर में इन्वेस्टमेंट, बैंकिंग सेक्टर में बढ़ते एनपीए से लेकर कई अहम मुद्दों पर बातचीत की है।
पेश है उनके साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश…
सवाल- ग्लोबल लेवल पर जिस तरह स्लोडाउन है, ऐसे में आप भारतीय इकोनॉमी को किस तरह देखते हैं, क्या इकोनॉमी ट्रैक पर आ गई है।
जवाब- अभी यह सेटीमेंट मिक्स है। अभी कोई निश्चित संकेत रिवाइवल का नहीं दिख रहा है। कुछ सेक्टर अच्छा कर रहे हैं। खास तौर पर कंज्यूमर रिलेटेड सेक्टर, जो कि डिमांड बेस्ड है। इसी तरह पब्लिक सेक्टर में सड़क, पावर जैसे सेक्टर में सुधार हुआ है। उसकी वजह सरकार द्वारा वहां इन्वेस्टमेंट बढ़ाना है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में धीमी गति है, प्राइवेट में इन्वेस्टमेंट काफी कम हो रहा है जो चिंता की बात है।
सवाल- ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को कहां पर कदम उठाने चाहिए, क्या उचित कदम अभी तक पूरी तरह से नहीं उठ पाए हैं
जवाब- देखिए सरकार ने नीतिगत स्तर पर कई अहम बदलाव किए हैं। पहले यह धारणा थी सप्लाई साइड और रेग्युलेटरी इश्यू की वजह से ग्रोथ नहीं आ रही है, वह सब हैंडल किया जा चुका है। ऐसे में अभी जो स्लो ग्रोथ की प्रॉब्लम है, उसके लिए नए फैक्टर सामने आ रहे हैं। अगर आप अगर आप हाल ही के सर्वे देखे जो तो उसमें देख सकते हैं, कि कैसे फैक्टर बदल रहे है। अभी स्लो ग्रोथ की वजह ग्लोबल फैक्टर है। जिसकी वजह से डिमांड कम है। इसका असर हमारे मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर पर निगेटिव हो रहा है।
सवाल- भारत इस समय सबसे तेजी से ग्रोथ करने वाली इकोनॉमी है, उसके बावजूद क्रेडिट ग्रोथ निगेटिव है, यह किस बात का संकेत है
जवाब- मेरा मानना है कि क्रेडिट ग्रोथ इकोनॉमिक एक्टिविटी का प्रमुख इंडिकेटर है। अभी जो ग्रोथ है वह रिटेल सेक्टर में है। जहां इंडस्ट्रियल क्रेडिट की बात है वह निगेटिव है, जो कि बहुत बुरे दौर में है। इसका सीधा सा मतलब इंडस्ट्री इन्वेस्टमेंट नहीं कर रही है। इसकी वजह से नई नौकरियों सहित दूसरे फैक्टर पर असर हो रहा है। भारतीय इकोनॉमी 7.5 फीसदी की ग्रोथ रेट से बढ़ रही है, जो अच्छी बात है। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपनी क्षमता की तुलना में ग्रोथ कर पा रहे हैं तो उसका जवाब यही है कि हम अपनी क्षमता की तुलना में ग्रोथ नहीं कर पा रहे हैं।
सवाल – 7.5 फीसदी ग्रोथ रेट होने के बावजूद हम इन्वेस्टमेंट में कहां कमजोर पड़ रहे हैं
जवाब- सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि प्राइवेट सेक्टर में इन्वेस्टमेंट नहीं हो रहा है। अभी जो इन्वेस्टमेंट दिख रहा है वह केवल उभरते सेक्टर में है। जैसे रिन्युएबल एनर्जी सेक्टर और डिफेंस सेक्टर में इन्वेस्टमेंट आ रहा है। उसमें भी डिफेंस सेक्टर में कंपोनेंट लेवल जिसे टरशियरी सेक्टर कहा जाता है, वहां पर इन्वेस्टमेंट हो रहा है। जिसकी वजह से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नई नौकरियां नहीं आ रही है। इस मामले में साल 2011 का दौर अच्छा रहा था, वैसा दौर अभी नहीं है।
सवाल- नई नौकरियां नहीं आ रही है, यह अब सभी प्रमुख आंकड़ों में सामने आ रहा है, ऐसे में हम कहां चूक कर रहे हैं
जवाब- जहां तक नई नौकरियों आने की बात है, तो यह लंबी अवधि का मामला है। साल 1971 से इलॉस्टिसिटी प्रॉब्लम है। उस समय से ही जीडीपी के मुकाबले नौकरियां नहीं आ रही है। बीच में एक दौर था, जब यह अनुपात सुधरा था। लेकिन ज्यादातर समय ऐसा ही रहा है। अब एक नया चैलेंज सबके सामने है। वह ऑटोमेशन का है। भारत में नौकरियों के लिए हमेशा से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर ही डिपेंड है। दौर बदल चुका है, आप केवल मैन्युफैक्चरिंग पर डिपेंड नहीं रह सकते। सर्विस सेक्टर पर फोकस बढ़ाना होगा। मौजूदा दौर में प्राइवेट सेक्टर काफी कन्फ्यूज है, वह यह नहीं समझ पा रहा है, कौन सी टेक्नोलॉजी पर इन्वेस्टमेंट करे, ऐसा इसलिए है कि ऑटोमेशन लेवल पर काफी अनिश्चितता है। इसी तरह कुशल लोगों की कमी है, एक्सपोर्ट सेक्टर में भी प्रॉब्लम है। हमारे लिए गुड जॉब क्रिएट करने का चैलेंज है। ऐसे में इसी पर फोकस होना चाहिए। ऑटोमेशन अब बेसिक लेवल पर भी हो रहा है, ऐसे में हमें नई नौकरियों के लिए नए सिरे से इन फैक्टर्स को सामने रखकर सोचना होगा।
सवाल- प्राइवेट इन्वेस्टमेंट बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए, जिससे ग्रोथ रेट बढ़े और नई नौकरियां आएं
जवाब-..प्राइवटे इन्वेस्टमेंट को लेकर हमारी सोच काफी पारंपरिक है। हम सोचते हैं कि सब कुछ सरकार कर दे। पिछले दो साल में सरकार को जो करना था, वह उसने कर दिए। एनवॉयरमेंट क्लीयरेंस सहित दूसरे रेग्युलेटरी स्तर पर जो किए जाने थे, वह कर दिए गए है। अभी इन्वेस्टमेंट में जो कमी है वह सरकार के दायरे से बाहर है। ग्लोबल स्तर पर प्रॉब्लम की वजह से ग्रोथ उम्मीद के अनुसार नहीं आ रही है। हमें यह स्वीकार करना होगा, कि मौजूदा माहौल में इससे ज्यादा ग्रोथ रेट नहीं हो सकती है।
सवाल- दुनिया में प्रोटेक्शनिज्म और डीग्लोबलाइजेशन के उदाहरण बढ़ रहे हैं, ऐसे में हम किस दिशा में जा रहे हैं
जवाब- देखिए अनिश्चितता इस समय हर स्तर है। टेक्नोलॉजी स्तर पर काफी बदलाव हो रहे हैं, जो डिसरप्शन को बढ़ावा दे रहे हैं। इसकी वजह से छोटे प्लेयर या नए प्लेयर भी प्रतिस्पर्धी होते जा रहे हैं। इस फैक्टर की वजह से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। अहम बात यह है कि ऐसे समय में यह सब हो रहा है, जब ग्लोबल स्तर पर डिमांड कम है। इन वजहों से प्रोटेक्शनिज्म और डी ग्लोबलाइजेशन जैसे इम्पैक्ट दिख रहे हैं।
सवाल- बैंकों का एनपीए काफी बढ़ा है, खास तौर से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में डिफॉल्ट ज्यादा है, इसे आप किस तरह से देखते हैं
जवाब- एनपीए की ज्यादातर प्रॉब्लम पब्लिक सेक्टर बैंक की है। प्राइवेट सेक्टर बैंक अच्छा कर रहे हैं। एसबीआई को छोड़कर सभी पब्लिक सेक्टर बैंक की इंडस्ट्रियल ग्रोथ निगेटिव है। उनका इंडस्ट्रियल सेक्टर को कर्ज देने में शेयर गिरा है। जो इस समय 73 फीसदी से गिरकर 67-68 फीसदी पर आ गया है। ऐसे में पब्लिक सेक्टर बैंक को अपने में अहम बदलाव करने होंगे। सरकार ने बैड बैंक का कॉन्सेप्ट पेश किया है, जो कि अच्छा आइडिया है, अगर इसे लागू किया जाता है, तो इस बैंकों और इंडस्ट्री पर पॉजिटिव असर होगा।

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