भारत-पाकिस्तान के बीच जारी तनाव

भारत-पाकिस्तान के बीच जारी तनाव के बावजूद पाकिस्तान चार दिसंबर को अमृतसर में अफगानिस्तान पर होने वाले हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में हिस्सा ले सकता है। हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन युद्ध से तबाह हो चुके अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण के कामों में तेजी और वहां शांति और स्थिरता लाने पर केंद्रित रहेगा। यद्यपि भारत में बहुत लोगों का ध्यान पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के दौरे पर होगा, लेकिन गौर करने लायक है कि सम्मेलन में 14 देश अफगानिस्तान, अजरबैजान, चीन, भारत, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, सऊदी अरब, तजाकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात भागीदारी करेंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भी इसको समर्थन हासिल है।
हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन नवंबर 2011 में इस्तांबुल कांफ्रेंस की भावना के अनुरूप किया जाता है, जो कि अफगानिस्तान की समस्याओं को दूर करने के लिए क्षेत्रीय सहयोग और विश्वास बहाली पर बल देती है। इसके साथ ही यह विचार अफगानिस्तान का विकास उसकी अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के अनुसार करने पर जोर देता है। भारत ने भी अफगानिस्तान को पुनर्निर्माण के लिए हरसंभव सहायता करने का लगातार संकल्प व्यक्त किया है। जहां तक पाकिस्तान का संबंध है तो उसकी भागीदारी क्षेत्रीय पुनर्निर्माण में उसके सहयोग को प्रदर्शित करेगी। पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए जरूरी है कि वह अफगानिस्तान में अपनी सकारात्मक भागीदारी को दर्शाए। हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन एक ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार किया हुआ है और दक्षिण एशिया में पाकिस्तान रहित क्षेत्रीय सहयोग कायम करने के मोदी सरकार के एजेंडे के साथ दृढ़तापूर्वक खड़ा है। यह अफगानिस्तान की सरकार ही थी जिसने सबसे पहले सुझाव दिया था कि पड़ोसी देशों को अस्थिर करने में पाकिस्तान की भूमिका के चलते इस्लामाबाद में होने वाले दक्षेस सम्मेलन का बहिष्कार करने के लिए दक्षिण एशिया के देशों को एकजुट होना चाहिए।
इस साल के आरंभ में अफगानिस्तान के दोनों सदनों के साझा सत्र में अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान के खिलाफ एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की धमकी भी दी थी। अपने पूर्व के बयानों से दूर हटते हुए गनी ने पाकिस्तान से तालिबान से बातचीत करने के प्रयास को त्याग देने और आतंकी संगठन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की अपील की। अफगान राष्ट्रपति ने धमकी दी कि यदि हमें परिवर्तन नहीं दिखा तो क्षेत्रीय सहयोग के लिए हमारी उम्मीदों और प्रयासों के बावजूद हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का रुख करने को बाध्य होंगे। पाकिस्तान के लगातार इस दावे के बावजूद कि वह तालिबान आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा, आज आलम यह है कि वार्ता तो ठप है ही, अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकी हमले लगातार बढ़ रहे हैं।
काबुल सरकार भी संसदीय चुनाव करने के लिए संघर्ष कर रही है। उसकी चुनौती वहां सुरक्षा की बदहाल स्थिति को लेकर है। अमेरिकी कमांडरों ने वाशिंगटन से कहा है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदा संख्या 9800 बनाए रखना चाहिए और इस साल के अंत तक इसे 5500 तक लाने का विचार छोड़ देना चाहिए। वहां राजनीतिक तनाव भी बढ़ रहा है। उपराष्ट्रपति जनरल अब्दुल राशिद दोस्तम राष्ट्रपति अशरफ गनी पर धमकी देने का आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने शिकायत की है कि अफगान सरकार तालिबान का सामना करने के लिए उत्तरी अफगानिस्तान को पर्याप्त सुरक्षा सहायता मुहैया नहीं करा रही है। इस सबके बीच पाकिस्तान ही है जो कि अफगानिस्तान में भारत की सकारात्मक भूमिका से भयभीत है। भारत वहां लगातार अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है और अफगानिस्तान की समस्याओं को दूर करने में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है। पाकिस्तान में सेना और खुफिया तंत्र का गठजोड़ नागरिक सरकार पर इस कदर हावी हो गया है कि इस्लामाबाद के लिए इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति होे गई है। उनका उद्देश्य बस यही रह गया है कि भले ही पूरा क्षेत्र्र ंहसा की चपेट में आ जाए या अस्थिर हो जाए, लेकिन भारत को किसी कीमत पर जीत नहीं मिलनी चाहिए। इसी भावना के तहत पाकिस्तान ने अफगानिस्तान और भारत के बीच व्यापार के लिए अपनी सड़कों के उपयोग को बाधित कर रखा है।
दूसरी ओर भारत के साथ अफगानिस्तान के संबंध लगातार मधुर हो रहे हैं। यदि पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के बीच वस्तुओं की आवाजाही के लिए अपनी सड़क खोलने की अनुमति दे देता है तो उसके परिवहन सेक्टर के लिए नई संभावनाएं खुल जाएंगी, फिर भी इस्लामाबाद ने इसकी तरफ से आंखें फेर रखी हैं। जिस प्रकार प्रतिदिन आम अफगानी भारत के साथ आसान और सीधे कारोबार का अवसर खोते जा रहे हैं, वैसे-वैसे पाकिस्तान के प्रति उनके मन में विरोध की भावना बढ़ती जा रही है।
अफगानिस्तान के प्रति भारत की नीति इन बदलती जमीनी सच्चाइयों के अनुरूप होनी चाहिए। नई दिल्ली अफगानिस्तान की स्थिरता और सुरक्षा के लिए विभिन्न हितधारकों के बीच तालमेल बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्र में आतंकी संगठनों और आतंक के सुरक्षित ठिकानों को ध्वस्त करने की मांग करती रही है। यह बात कहना तो आसान है, लेकिन करना उतना ही मुश्किल। अफगानिस्तान में भारतीय हितों को लगातार निशाना बनाया जाता रहा है। इस साल मार्च में जलालाबाद में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हुआ हमला 2007 के बाद से चौथा आक्रमण है। अफगानिस्तान की नई संसद के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अफगानिस्तान दौरा और अफगान सेना को नई दिल्ली द्वारा एमआइ-25 हेलीकॉप्टर भेंट करने का फैसला अपने समस्याग्रस्त पड़ोसी देश की सुरक्षा के प्रति भारत की गंभीरता को रेखांकित करता है। भारत ने तापी पाइपलाइन गैस समझौते पर भी हस्ताक्षर किए हैं। भारत ने ईरान में सामरिक महत्व वाले चाबहार बंदरगाह को विकसित करने का भी करार किया है और अफगानिस्तान के जरिये परिवहन और व्यापार गलियारा बनाने के लिए तीन देशों की संधि पर हामी भरी है। इससे मध्य एशिया और यूरोप के साथ कारोबार करने में समय और लागत, दोनों में कमी आएगी। नई दिल्ली ने अब तक अफगानिस्तान के साथ जुड़ने के लिए अप्रत्याशित दृढ़ता दिखाई है। अब जरूरत इस बात की है कि भारत आर्थिक और सैन्य सहयोग से आगे जाते हुए अफगानिस्तान के संदर्भ में एक समग्र नीति विकसित करे, जिसमें सभी आयाम शामिल हों। अफगानिस्तान एक कठिन देश है। जाहिर है, जो विभिन्न मोर्चों पर लड़ने का माद्दा रख रहे हैं सिर्फ वे ही अपने आप को सुरक्षित रखने में सफल होंगे।

 

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