‘शोले’ के सक्सेज की कहानी जावेद अख्तर की ज़ुबानी

भोपाल- जावेद अख्तर शनिवार को भोपाल आए। यहां उन्होंने गुफ्तगू के दौरान भोपाल और अपने जीवन से जुड़ी कई जानी-अनजानी बातें शेयर कीं। भोपाल में बीते उनकी जिंदगी के चार साल कैस रहे? सुरमा भोपाली जैसा कैरेक्टर कहां से और कैसे आया? आज के दौर के गानों पर उनका क्या कहना है? और शोले के हर किरदार के अमर होने की क्या कहानी है?
सवाल: एक फिल्म है शोले…। इसका हर सीन, हर डायलॉग, हर कैरेक्टर लोगों रटा हुआ है। असरानी अंग्रेजों के जमाने के जेलर ही रहे। जगदीप कभी सूरमा भोपाली के कैरेक्टर से बाहर नहीं निकल सके। आखिर इस फिल्म ने ये जादू कैसे पैदा किया? ऐसे कैरेक्टर, वैसे लीजेंडरी डायलॉग आखिर निकले कहां से?
जवाब: देखिए क्या होता है कि साइंस में एक चीज कहलाती है कॉज एंड इफेक्ट, हमारे यहां शो बिजनेस में उल्टा है। इफेक्ट एंड कॉज। यहां फिल्म सफल होने के बाद उसकी सक्सेस के कारण ढूंढें जाते हैं। एक बार साहिर लुधियानवी साहब कहने लगे अच्छी फिल्म ऐसी होती है। जैसे ऊंट का मसाला। एक आदमी ऊंट का मसाला बना रहा था। सारी रात वो उसे बनाता रहा। सुबह देखा तो वो सोना था। उसके बाद वो पूरी जिंदगी ढूंढता रहा कि आखिर मैंने ऐसा क्या डाला कि वो सोना बन गया। ऐसा ही हमारी फिल्मों में होता है। इसी तरह की मिसाल मैं दूंगा नदियों से। हर नदी अपना रास्ता अपनी तरह से बनाती है। उसका रास्ता इस बात से तय होता है कि वो जहां से गुजर रही है वहां पहाड़ है या मैदान है या रेगिस्तान है। ऐसे ही कामयाब लोग होते हैं और यही बात फिल्मों पर लागू होती है। वो एक ही बार होता है। दोबारा आप उसी फार्मूले से वहीं जादू दोबारा होगा नहीं पैदा किया जा सकता। असल में जब ये फिल्म बनी थी। तो इंडस्ट्री ने इसे फ्लॉप बता दिया गया था। उस वक्त की मानी हुई ट्रेड मैग्जीन ने बुधवार के दिन स्पेशल एडीशन निकालकर बताया कि ये फिल्म क्यों नहीं चलेगी। जबकि उसका एडीशन शनिवार के दिन छपता था। सभी फिल्म क्रिटिक्स ने भी शुरुआती तीन हफ्ते ऐसा ही कहा। इसके बाद भी फिल्म चली।
सवाल: सुरमा भोपाली कैरेक्टर कहां से आया?
जवाब: सूरमा निहार सिंह थे जिन्हें सब सूरमा कहते थे। एक किस्सा है 20वीं सदी की शुरुआत में एक आदमी था वो ऐसा समझता था कि मैं कैलिफोर्निया का किंग हूं। लोग उसे वैसे ही इज्जत देते थे। उसकी डेथ पर लोग उसके फ्यूनरल में भी उसे किंग की तरह ले गए। ऐसे ही सूरमा निहार सिंह थे। उनके साथ पुराने भोपाल में ऐसा ही ह्यूमर क्रिएट किया गया। जब शोले रिलीज हुई। तब एक शख्स ने उन्हें यकीन दिलाया कि जावेद साहब आपके नाम से बहुत पैसा कमा रहे हैं। आप उनके ऊपर केस क्यों नjaved-akhtar-1हीं करते। जब दीवार रिलीज हुई तो वो वकील के साथ फिल्म देखने गए। उसमें कोई ऐसा कैरेक्टर नहीं था। लोग कहते हैं कि जब फिल्म में अमिताभ ये कहते हैं कि मेरे पास गाड़ी है, बंग्ला है तुम्हारे पास क्या है। तो फिल्म देख रहे सुरमा कहते हैं देखो ये जावेद मुझसे कह रिया है।सवाल:जांनिसार अख्तर का बेटा होना, स्टार शबाना आजमी का पति होना, फरहान-जोया का पिता होना और खुद जावेद अख्तर होना, स्क्रिप्ट रायटर हैं। जो शायर हैं। लिरिसिस्ट हैं। डायलॉग लिखते हैं। इन सबके बीच आप अपने आप को किस रोल में सबसे ज्यादा फिट पाते हैं?
जवाब: अरे साहब देखिए रोल तो हर आदमी की जिंदगी में सैकड़ों होते हैं। एक एवरेज आदमी को देखिए वो किसी का भाई है। किसी का दोस्त है, किसी की पति है। हम सब के सब जिंदगी में सैकड़ों रोल करते हैं। मेरा तो प्रॉब्लम अलग रहता है। जब मैं लखनऊ में था तो लोग कहते थे ये मजाज का भांजा है। जब भोपाल आया तो लोग कहते थे ये जांनिसार अख्तर का बेटा है। जब शबाना से शादी हुई तो लोग कहने लगे ये शबाना के पति हैं। जब बच्चे बड़े हुए तो लोग कहने लगे ये फरहान के पापा हैं। कई बार तो कुछ लड़कियां मिलती हैं जो कहती हैं अरे अंकल आप तो बिलकुल फरहान की तरह लगते हैं।

सवाल: भोपाल सेफिया कॉलेज में ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान आप अपने फ्रेंड ऐजाज के साथ रहते थे। वही रूम का रेंट देता था.. सिगरेट का पैसा मुस्ताक सिंह देते थे.. और नाहर सिंह जिसमें आपने सूरमा भोपाली खोज लिया.. आप भोपाल में हैं तो जहन में उस दौर के कौन से फ्लैशबैक चल रहे हैं?
जवाब: देखिए मैं जब छोटा था तो एक हमारे फैमिली फ्रेंड थे सहगल साहब उन्होंने एक बात कही थी बेटा जितने दोस्त बना सकते हो बना लो। इसी उम्र में दोस्त बनते हैं बाकी तो बिजनेस रिलेशन बनते हैं। भोपाल के लोग मेरा शुक्रिया अदा करें तो मुझे शर्मिंदा करेंगे। यहां मैं चार साल रहा हूं। मेरे दोस्तों ने मुझे पाला है। मैं जिस कॉलेज में पढ़ता था उन्होंने मुझसे कभी फीस नहीं ली। मैं डिबेट में जाता था तो पैसे भी वही देते थे। मैं बोलता था मेरे पास कपड़े भी नहीं हैं तो वो कपड़े भी उन्होंने दिए। इस शहर से मेरा रिश्ता तो एक एहशान का है।
सवाल: आपके ही शब्दों को उधार लेकर मैं कहूं कि आजकल मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते हैं… तुम होती तो कैसा होता… तुम होती तो वैसा होता.. तुम इस बात पर हैरां होती… ‘आखिर डीके बोस साबुन की शकल में केवल झाग ही कैसे हैं?’ मैं तेरे साथ गंदी बात करूंगा…’, आपका इन गानों के बारे में क्या कहना है?
जवाब: अरे साहब बहुत-बहुत शुक्रिया खैर उन्हें गाने तो कहते हैं आप…। ये सब चीजें एक दूसरे से कनेक्टेड होती हैं। समाज से भाषा जा रही है। बहुत कम लोग हैं जो प्रॉपर हिंदी, इंग्लिश या कोई भी जबान जानते हैं। लैंग्वेज अब केवल कम्युनिकेशन के लिए रह गई है। उसके बाहर जो आदमी काम करने जाता है वो उसने कभी नहीं किया। उसने कभी पोएट्री पढ़ी नहीं। आप चीजें ट्रांसलेट नहीं कर सकते हैं। खासतौर पर पोएट्री। एक चीज हमारे समाज में आउट ऑफ फैशन हो गई है। वो है डिग्निटी। आप अगर प्रॉपर तरीके से बात करते हैं तो इट्स नॉट कूल। व्लगैरिटी की तरफ चलें जाएं तो उसके पांच नंबर अलग मिलेंगे। ये वेस्टनाइजेशन का भोंड़ा तरीका है। वही चीजें आज फिल्म में भी दिखती हैं। हमारी कहावतें सब चली गईँ।
सवाल: आपने अमिताभ उर्फ विजय को एंग्री यंगमैन बनाया था। वो वैल्यूज के लिए जान देता था, आज का एंग्री यंग मैन US वीजा पर जान देता है। आपका एंग्री यंग मैन सिस्टम को बदलना चाहता था। आज का एंग्री यंग मैन सिस्टम को सिर्फ अपने लिए बदलना चाहता है..? आपका एंग्री यंग मैन आज के एंग्री यंग मैन से कैसे डिफर है?
जवाब: आज का एंग्री यंग मैंन है कहां? पहले तो ये पता लगाना पड़ेगा। 60-70 और 80 के दशक की फिल्मों का हीरो वर्किंग क्लास का होता था। रिक्शे वाला, डॉक्टर, वकील जैसे। अब हमारी एवरेज फिल्मों का हीरो कोई काम नहीं करता। अमीर होता है। बाहर निकलता है तो उसके पैर सीधे स्विट्जरलैंड में पड़ते हैं। आज कहानी में बहुत वैरिएशन आ गया है पर आज के फिल्म मेकर मिडिल क्लास लोवर मिडिल क्लास के विषयों पर फिल्म बनाने से बचते हैं। इसका कराण है हमारा स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग जो बहुत ऊपर आया है। देश के न्यूज चैनल भी वही न्यूज दिखाते हैं जो वो वाला आदमी देखेगा जो वो प्रोडक्ट खरीद सकता है। जो उस चैनल पर दिखाए जाएंगे। जो गांव वाला है वो क्रीम नहीं खरीदेगा। वो शैम्पू नहीं लेगा। वो एयरकंडीशनर नहीं खरीदेगा। इसलिए उससे जुड़ी न्यूज नहीं दिखाई जाएगी। ईसी तरह हम वही लिख रहे थे जो लोग सोच रहे थे। बहुत से ख्याल ऐसे होते हैं जिनके कोई फेस नहीं होते। बहुत से फीलिंग ऐसी होती हैं जिन्हें शब्द नहीं मिले होते। जब कोई इन फीलिंग को शब्द दे देता तो वो कहते अरे यही तो हमारे दिल में था। धीरे-धीरे वो आयकॉन बन जाता है। जब यही चीज बढ़ती जाती है तो वो कार्टून बनने लग जाता है। यही एंग्री यंग मैन के साथ हुआ।
सवाल: एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे खिलता गुलाब.. इतनी मिसालें! कैसे बना था ये गाना…? कहां से आईं थीं इतनी मिसालें?
जवाब: जब मैंने स्क्रिप्ट सुनी, तो मैंने सजेस्ट किया कि एक गाना यहां आ सकता है जब वो लड़की को ढूंढ रहा है। तब आरडी बर्मन और विधु विनोद चोपड़ा ने कहा ठीक है लिख दीजिए। शनिवार की बात थी। बुधवार को गाने को लेकर सिटिंग तय हुई। पर मैं भूल गया। बुधवार को जाते हुए पूरे रास्ते मैं ये सोचता रहा कि क्या करूं क्या करूं। फिर मुझे एक आइडिया आया। वहां पहुंचकर मैंने उन्हें कहा गाने की शुरुआत ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ से होगी। इसके आगे सिमलीज आएंगी। वहीं बैठे-बैठे मैंने कुछ सिमलीज लिखीं और उन लोगों ने वहीं म्यूजिक क्रिएट किया। तीसरे अंतरे तक पहुंचते तक मेरी सांस फूली पर वो बन गया।
सवाल:फिल्में लिखते हैं तो आक्रोश और बदले से भरी; शोले/जंजीर/दीवार/त्रिशूल…, गाने लिखते हैं तो एक्स्ट्रीम इमोशन से भरे; देखा एक ख्वाब… एक लड़की को देखा तो.. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी ने राइटिंग में इतना कंट्रास्ट काम नहीं किया है। आप कैसे इतने एक्स्ट्रीम एंड से दूसरे इमोशन पर शिफ्ट कर लेते हैं?
जबाव: वैसे तो आक्रोश भी एक इमोशन है। मैं तो दुनिया से छुपाता नहीं हूं कि मैं नास्तिक हूं। मेरे दोस्त कहते हैं तुम झूठ बोल रहे हो। कोई भी नास्तिक आदमी ये नहीं लिख सकता ओ पालन हारे। लेकिन ऐसा नहीं है। जो प्रोफेशनल राइटर है उसे खुद को सिचुएशन के हिसाब से ढालना आना चाहिए।
सवाल: बिली वाइल्डर का कहना था कि डायलॉग गरीब आदमी के टेलीग्राम की तरह होने चाहिए। एकदम संक्षिप्त। शायरी कैसी होनी चाहिए…? डायलॉग लिखने और शायरी लिखने में क्या आसान है? क्यों आसान है?
जवाब: दुनिया में हर काम आसान है अगर आप हर काम बुरी तरह करना चाहें। और हर काम करना मुश्किल है जब आप अच्छी तरह करना चाहें। हमारे यहां म्यूजिक में एक वर्ड है तैयारी। तैयारी जा चुकी है। इनपुट है नहीं आउटपुट की तैयारी है। सिर्फ फिल्म देखकर डॉयलग नहीं लिखे जा सकते। इसी तरह सिर्फ फिल्मीं गाने गाकर आप लता मंगेशकर नहीं बन सकते। उसके लिए आपको शास्त्रीय संगीत भी उतना ही आना चाहिए।
सवाल:आपकी एक नज्म है… फिरते हैं कब से दर बदर, अब इस नगर, अब उस नगर, एक दूसरे के हमसफर मैं और मिरी आवारगी…आपकी पर्सनल लाइफ खुद किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। आपने बचपन से लेकर जवानी तक बहुत उतार-चढ़ाव देखे.. आपकी जिंदगी के इसी संघर्ष पर कौन सी नज्म सटीक बैठती है?
जवाब: एक बात बताऊं आपको पागल होने की सबसे आसान तरकीब है अपने बारे में सोचना चाहिए। मैं कौन हूं मैं क्यूं हूं, कॉसमॉस से मेरा क्या रिश्ता है। ये सब जब आप अपने बार में सीरियसली सोचना शुरू करते हैं। जब लोग अपनी नादानियों पे, अपने ह्यूमिलेशन पे अपने दुख को बता रहा होता तो माफ कीजिएगा वो दुख को नहीं बता रहा होता बल्कि ये कह रहा होता है कि देखो मैं कहां आ गया। जैसे दौर से मैं गुजरा वैसा हमारे समाज में ज्यादातर लोग ऐसे गुजरते हैं।
सवाल: आजकल की यंग जेनरेशन बहुत लॉजिकल है। उसे इमोशन में भी खालिस इमोशन नहीं चाहिए। वहां भी लॉजिक होना चाहिए। आज खुश तो बहुत होंगे तुम… वो आदमी जो कभी तुम्हारे मंदिर भी… आज का विजय मंदिर में शिवजी से क्या बात करेगा?
जवाब: हमने भी इतना ड्रमैटिक कर दिया कि उसके ईक्वल और अपोजिट रिएक्शन हुए। लॉजिकल होने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन लॉजिकल होने में इनसेंसटिव होने की जरूरत नहीं हैं।
सवाल: विजय के किरदार को कैसे डिजाइन किया जिसने हिन्दी सिनेमा की तकदीर को डिफाइन कर दिया था?
जवाब: वो बहुत अच्छे एक्टर हैं। ये जंजीर या दीवार उनके लिए नहीं लिखी गई थीं। उस दौर में उनकी फिल्में चल नहीं रही थीं। पर आप देख सकते थे एक्टर लाजवाब हैं। हम लोगों ने जब उनका काम देखा तो हमने प्रोड्यूशर्स और डायरेक्टर्स को कनवेंस किया कि इस एक्टर को लीजिए। उन्होंने जिस तरह का काम किया उसके बार में आप सब जानते हैं।

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