कठीन तपस्या और हर्ष उल्लास से भी भरा है छठ पूजा

देहरादून: लोक पर्व छठ एक कठिन तपस्या है, इसमें न कोई पंडित होता है और न कोई जात-पात। छठी माता के साथ इसमें सूर्य की आराधना होती है। पूजा में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री भी प्राकृतिक होती हैं। उल्लास से लबरेज इस पर्व में सेवा और भक्ति भाव का विराट रूप दिखता है। यह पर्व नहाय-खाय के साथ चार नवंबर को शुरू होगा, जो चार दिन तक चलेगा।

छठी माता और सूर्य उपासना का यह अनुपम पर्व पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। देहरादून में पूर्वांचल के लोग बड़ी संख्या में बसे हैं, तो यहां भी उल्लास कम नहीं होता। छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और अध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडाल की जरूरत होती है और न ही भव्य सजे मंदिर और मूर्तियों की।

सभी तरह के शोर से दूर यह पर्व बांस निर्मित सूपों व टोकरी, मिट्टी बर्तनों और गन्ने के रस, गुड, चावल, गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की मिठास का प्रसार करता है। इस पर्व का केंद्र वेद पुराण जैसे धर्मग्रंध न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है।

सभी कृतज्ञतापूर्वक सेवा को तैयार रहते हैं। खास बात ये है कि इस पर्व को मनाने के पूर्वांचल और बिहार के लोग सरकारी इंतेजामात के मोहताज नहीं रहते। सभी एकजुट होकर घाटों की सफाई से लेकर अन्य तैयारियों में जुट जाते हैं। चार दिन तक चलने वाले इस पर्व दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा और भक्ति भाव से किए गए सामूहिक कर्मों का अद्भुत प्रदर्शन होता है।

बिहारी महासभा के अध्यक्ष सतेंद्र सिंह का कहना है कि टपकेश्वर महादेव मंदिर स्थित घाट पर सफाई शुरू कर दी गई है। सभी तैयारी में जुटे हैं। सात नवंबर को राज्य सरकार ने छुट्टी घोषित की है, इससे सभी में हर्ष का माहौल है।

छठ पूजा में कब क्या
चार नवंबर: नहाय खाय
इस दिन व्रती सुबह स्नान कर लौकी और चावल से बने प्रसाद को ग्रहण करती हैं।

पांच नवंबर: खरना
खरना के दिन उपवास शुरू होता है और परिवार की श्रेष्ठ महिला 12 घंटे का निर्जला उपवास करती हैं। शाम के वक्त छठी माता को बूर वाली खीर और रोटी से बना प्रसाद चढ़ाया जाता है। साथ ही मौसम के तमाम फल छठी मां को अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद खीर और रोटी के प्रसाद से महिलाएं निवृत होती हैं। व्रत को श्रेष्ठ महिला के अलावा अन्य महिलाएं व पुरुष भी कर सकते हैं।
बंद हुए गंगोत्री धाम के कपाट, मुखवा में होगी शीतकालीन पूजा

छह नवंबर: संध्या अर्घ्य (पहला अर्घ्य)
खरना का उपवास खोलते ही महिलाएं 36 घंटे के लिए निर्जला उपवास ग्रहण करती हैं। पहले अर्घ्य के दिन बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूपा सजाया जाता है। शाम के वक्त व्रती नदी किनारे घाट पर एकत्र होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देती हैं।
सुबह बालिका, दिन में युवा और शाम को वृद्धा के रूप में दर्शन देती हैं मां धारी देवी

सात नवंबर: ऊषा अर्घ्य (दूसरा अर्घ्य)
इस दिन सूर्य उदय से पहले ही व्रती घाट पर एकत्र हो जाती हैं और उगते सूरज को अर्घ्य देकर छठ व्रत का पारण करती हैं। अर्घ्य देने के बाद महिलाएं कच्चे दूध का शरबत पीती हैं।

Check Also

वरुण के कांग्रेस में एंट्री पर राहुल गांधी का बड़ा बयान

राहुल गांधी के नेतृत्व में निकाली जा रही भारत जोड़ो यात्रा मंगलवार को पंजाब के …