त्यौहारों के मौसम में प्रधानमंत्री के संबोधन की उपादेयता

कृष्णमोहन झा

देश में जब कोरोना संक्रमण की शुरुआत हुई थी तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में ही कोरोना संकट की गंभीरता के प्रति देशवासियों को सचेत कर दिया था और अब जबकि देश में कोरोना संक्रमण के आंकड़े तेजी से घट रहे हैं तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुन: राष्ट्र के नाम अपने संदेश में देशवासियों को आगाह कर दिया है कि अभी निश्चिंत होकर बैठने का समय नहीं आया है। कोरोना से बचाव हेतु जो सावधानियां हम पहले बरत रहे थे, उनमें कोई ढिलाई नहीं आना चाहिए। प्रधानमंत्री का आशय स्पष्ट था कि हमारी जरा सी भी लापरवाही हमें बहुत महंगी पड़ सकती है। प्रधानमंत्री पहले भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक इन सावधानियों को बरतने के अलावा कोरोना से बचाव का हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है। चंद शब्दों में ही लोगों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ने में दक्ष प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल में ही दिया गया यह नारा भी काफी लोकप्रिय हुआ था कि- जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि देशवासियों ने भी अब इस सच को स्वीकार कर लिया है कि जब तक दुनिया के वैज्ञानिकों को कोरोना की वैक्सीन तैयार करनें में सफलता नहीं मिल जाती तब तक मास्क ही वैक्सीन है लेकिन यही बात जब प्रधानमंत्री के द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन के रूप में कही गई तब निश्चित रूप से लोगों के मन मस्तिष्क पर उसका विशेष प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था, इसीलिए प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने इस संदेश में लोगों से जोर देकर कहा कि वे घर से बाहर निकलते समय मास्क लगाने और सार्वजनिक स्थानों पर दो गज की दूरी कायम रखने में कोई कोताही न बरतें। गौरतलब है कुछ समय पूर्व एक अन्य  मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि जिन लोगों को मास्क पहनने मे परेशानी होती है, उन्हें अस्पतालों में भर्ती कोरोना मरीजों के इलाज में समर्पण भाव से जुटे उन चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों से सबक लेना चाहिए, जो हमेशा मास्क और पीपीई किट पहने रहते हैं।

प्रधानमंत्री ने लोगों को मास्क पहनने की अनिवर्यता समझाने के लिए जो उदाहरण दिया, उससे अच्छा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता था। प्रधानमंत्री की यह  बात भी सौ फीसदी सही है कि लॉकडाउन भले ही उठा लिया गया हो परंतु कोरोना संकट से हमें निजात नहीं मिली है, इसीलिए घर से बाहर निकलते समय मास्क पहनने और सार्वजनिक स्थानों पर दो गज की दूरी कायम रखने की अनिवार्यता को हमें स्वीकार करना ही होगा। प्रधानमंत्री ने मीडिया से भी इस बारे में लोगों को सचेत व जागरूक करने के लिए सहयोग देने की जो अपील की उसका निहितार्थ यही है कि कोरोना के विरुद्ध जारी लड़ाई में समाज के हर वर्ग का सहयोग आवश्यक है। केवल सरकारी प्रयासों से कोरोना को परास्त नहीं किया जा सकता। कोरोना को हराने के लिए हम जो लड़ाई लड़ रहे हैं, वह सबके सामूहिक प्रयास से ही जीती जा सकती है।

देश में कोरोना संक्रमण की शुरुआत होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम यह सातवां संबोधन था और विशेष उत्सुकता के साथ देशवासी इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। लोगों की उत्सुकता इस बात को लेकर थी कि जब देश में कोरोना संक्रमण के आंकड़ों का ग्राफ तेजी से नीचे की ओर जाना शुरू हो गया है तब सरकार कोरोना संकट से निपटने की रणनीति में क्या बदलाव करने जा रही है परंतु राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री के सातवें संदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार त्यौहारों के इस मौसम में भीड़भाड़ बढ़ने की संभावना को देखते हुए अब पहले से भी अधिक सावधानी बरतने की जरूरत पर जोर देने की पक्षधर है। प्रधानमंत्री के इस संबोधन का एकमात्र उद्देश्य भी अगर यही माना जाए तो गलत नहीं होगा। प्रधानमंत्री के इस संदेश में उनकी इस मंशा को समझना कठिन नहीं था कि कोरोना के विरुद्ध लगभग सात माह से जारी अपनी लड़ाई में हमने अथक प्रयासों से जो सफलता अर्जित की है वह त्यौहारी मौसम में हमारे अति उत्साह के कारण फीकी नहीं पड़नी चाहिए। प्रधानमंत्री ने लोगों को अपनी बात बेहतर ढंग से समझाने के लिए लोकप्रिय दोहे और सोरठे का भी सहारा लिया। इस तरह से लोगों को अपनी बात से राजी करने में प्रधानमंत्री को निश्चित रूप से सफलता मिली होगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस संबोधन में आंकड़ों के माध्यम से यह भी बताया कि सरकार ने कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए समय रहते जो प्रभावी कदम उठाए उनकी वजह से ही विश्व के अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां उसका प्रकोप बहुत कम रहा। दूसरे देशों में कोरोना की जो दूसरी लहर आई वैसी स्थिति हमारे देश में न पाए इसलिए हमें अब विशेष सतर्कता बरतनी होगी। गौरतलब है कि देश के अनेक वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञ भी विगत दिनों यह कह चुके हैं कि ठंड के दिनों में कोरोना से मिलते-जुलते लक्षणों वाली दूसरी अनेक बीमारियों के पनपने की आशंका होती है,इसलिए अगले दो तीन माहों के दौरान हमें विशेष सावधानी बरतनी होगी। यही बात प्रधानमंत्री ने अपने सातवें संदेश में और बेहतर तरीके से कही है। प्रधानमंत्री ने इस संदेश में लोगों को यह भरोसा भी दिलाया कि कोरोना की वैक्सीन बनाने में देश के वैज्ञानिकों को सफलता मिलते ही अधिकतम लोगों तक उसका लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की तैयारी जारी है।

देश में कोरोना वायरस के प्रकोप पर अंकुश लगाने में अब सफलता मिलती दिखाई देने लगी है। जितने लोगों को यह वायरस प्रतिदिन संक्रमित कर रहा है, उससे अधिक संख्या में लोग रोजाना ही अस्पतालों से स्वस्थ होकर अपने घरों को लौट रहे हैं। कोरोना से रोजाना होने वाली मौतों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। देश में कोरोना के प्रकोप की शुरुआत होने के बाद यह सुखद स्थिति आने में लगभग 6 माह लगे हैं और यदि कोरोना वायरस की मारक क्षमता इसी तरह लगातार घटती रही तो कुछ माहों में रोजमर्रा की जिंदगी में सुकून लौटने की  सुखद स्थिति निर्मित होने की उम्मीद भी की जा सकती है, यद्यपि अभी यह मान लेना बहुत जल्दबाजी होगा कि अब कोरोना से डरने की कोई जरूरत नहीं है। कोरोना संक्रमण के मामलों में लगातार कमी के बावजूद चिकित्सा विशेषज्ञों की राय यही है कि यूरोपीय देशों के अनुभव को देखते हुए हम कोरोना के फिर सिर उठाने के खतरे को नजरअंदाज करने की भूल हमें भी महंगी पड़ सकती है और यह कोरोना को फिर से पांव पसारने का अवसर उपलब्ध कराने जैसा होगा।

दुनिया के दूसरे देशों के साथ साथ हमारे देश के अंदर दिल्ली में कोरोना संक्रमण के दूसरे पीक का सामना करना पड़ा है। अत: कोरोना से सुरक्षा के लिए अभी तक हम जो सावधानियां बरत रहे थे, उनमें लेशमात्र ढिलाई भी नहीं आना चाहिए। गौर तलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में ही इसी सिलसिले में एक जन आंदोलन की शुरुआत की घोषणा की थी। उन्होंने अपने हर संदेश में दो गज की दूरी के साथ मास्क है जरूरी के जीवन मंत्र को आत्मसात करने पर बल दिया है। लोग भी इस सच को स्वीकार करने लगे हैं कि जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक मास्क को वैक्सीन ही मानकर इस संकट का सामना करना होगा। प्रधानमंत्री ने अपने इस संबोधन के लिए जो समय चुना उससे अधिक उपयुक्त और कोई समय नहीं हो सकता था इसके लिए प्रधानमंत्री भूरि-भूरि प्रशंसा के हकदार हैं। प्रधानमंत्री ने आने वाले सभी धार्मिक पर्वों के लिए लोगों को बधाई देते उन्हें जिस तरह सचेत भी कर दिया है, उससे उनके संदेश की उपादेयता और बढ गई है। प्रधानमंत्री के इस संदेश को अगर सारे देशवासी आत्मसात कर लें तो हम आगत वर्ष की पहली तिमाही में कोरोना पर विजय की खुशी मनाने की संभावनाओं को बलवती बना सकते हैं।

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