तालिबान ने भारत से लगाई मान्यता की गुहार, भारत का स्टैंडबाई मोड ऑन

सुशांत प्रमोद I तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान की छाती पर जो मूंग दल रहा है, उसे लगभग पूरी दुनिया जान चुकी है सिवाय उसके कुछ साथी रहबर देशों के. अब तालिबान ने भारत से दांत चियारकर अपनी मान्यता की गुहार लगाई है. चीन की गोदी में पल रहे पाकिस्तान ने तोतला होते हुए भी एकदम साफ़ ज़बान में उसे अपना ‘ भाईजान ‘ कहना शुरू कर दिया है. इधर तालिबान रूस के भी हांथ-पांव चाटकर उससे भारत पर दबाव डलवाने की कोशिश में हैं. अब भारत का ऊंट किस करवट बैठेगा ? यह बहुत सारे विश्लेषण के बाद समझ में आएगा.

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तालिबान के अब्बा और अपाहिज भाई की करतूत

तालिबान ने जो चाल भारत का मनाने के लिए चली है. उसे भारत बहुत अच्छे से समझता है. तालिबान की धूर्त कोशिशों और झूठे बयानों से हम पहले ही वाकिफ है. भारत जैसा सेक्युलर देश भला किस बिनाह पर किसी धार्मिक सत्ता का समर्थन कर सकता है ? और अगर करता है तो उसके क्या कूटनीतिक फायदे या नुकसान होंगे ? इस पर देश को सोंचना है और फ़ैसला करना है.

भारत ये अच्छे तरीके से जानता है कि तालिबान की कोई भी चाल महज उसी की चाल नहीं होती. बल्कि, उसके पीछे उसके दो अब्बा, चीन और रूस के साथ उसके तोतले ,अपाहिज भाई पाकिस्तान की भी करतूते शमिल रहती हैं. भारत ने समझदारी दिखाते हुए अभी इस पर अपने क़दम पीछे खींच लिए हैं.

पहले से तैयार है भारत

अमेरिकी सेनाओं ने जैसे ही तालिबान छोड़ने का फ़ैसला लिया था, ठीक उसी पल से भारत अफ़ग़ानिस्तान में अपने लोगों को निकालने में जुट गया था. वह भविष्य की हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयारी करने लगा था. भारत के लिए उसके अपने नागरिक सुरक्षित हों, यह ही सबसे महत्वपूर्ण बात है. अन्य देश भी इसी नीति पर काम कर रहे हैं. हालांकि, पूरी दुनिया की तरह भारत को भी इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि काबुल इतनी जल्दी इन तालिबानियों की मुट्ठी में आ जायेगा.

मान्यता के बगैर है भीगी बिल्ली

तालिबान ने भारत के सामने ऐसे ही मान्यता की गुहार लगाई है. बगैर भारत की मान्यता मिले तालिबान एशिया में राजनैतिक स्तर पर अपने पैर नहीं पसार सकता है. यह बात उसके समर्थक अब्बा और भाई सब भली-भांति जानते हैं. इसीलिए तालिबान बार-बार अपने आपको रंग-पोत कर नया चेहरा दिखाने की कोशिश किया करता है. यहां तक कि उसने अफ़ग़ानिस्तान के बड़े राजनैतिक चेहरों को सामने खड़ा करके एक शांतिपूर्ण सरकार होने का दावा भी किया है. अगर भारत मान्यता दे देता है तो तालिबान कूटनीतिक तौर पर दुनिया में सम्मान पा सकता है. लेकिन यह तालिबान के लिए नाकों चने चबाने जैसा है.

इतना ही नहीं, तालिबान ने भारत के सामने बहुत सारे फ़ायदे पूर्ण प्रस्ताव भी रखे हैं. तालिबान भारत से अपनी सारी पुरानी परियोजनाएं, जो अफ़ग़ानिस्तान सरकार के साथ चल रहीं थीं या चालू होने वालीं थीं , को पूरी तरह से बेझिझक जारी रखने की बात कह रहा है. लेकिन उसके बदले बस उसे भीख में मान्यता चाहिए.

स्टैंडबाई मोड पर है भारत

इधर भारत अभी ‘वेट एंड वाच’ की नीति अपनाते हुए चुपचाप सारी स्थितियों पर नज़र टिकाये हुए है. हालांकि, भारत ने अपनी तरफ से बातचीत के सारे रास्ते खोल रखे हैं. लेकिन भारतअभी स्टैंडबाई मोड पर खड़ा हुआ देश है. वह दुनिया की अन्य महाताकतों जैसे अमेरिका, इंग्लॅण्ड आदि की राय भी परखना चाहता है.

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गौर करने वाली बात यह भी है कि सर्वदलीय बैठक में भी सभी दलों के लोग इस बात से सहमत नज़र आये कि भारत का अभी इस मामले पर चुप रहना ही बेहतर है. जबतक अमेरिका जैसे देश इस स्थिति पर अपनी राय साफ नहीं कर देते, तब तक भारत भी अपनी जगह पर शांति से बैठा रहे.

खैर, भारत के लिए यह तो साफ तौर पर कहा जा सकता है कि अगर वो तालिबान को मंज़ूरी दे देता है, तो वह अपने देश को सीना ठोककर सेक्युलर कहने की स्थिति में नहीं रह पायेगा. कौन जान सकता है कि कल को यहां भी कोई धार्मिक कट्टरता का परचम लहरा दे और भारत में एक नया तालिबान शुरू कर दे ? इसीलिए भारत कभी भी ऐसे देश के साथ खड़ा होना बिल्कुल नहीं पसंद करेगा जिसका इतिहास मानवता की अधनंगी लाशों की नींव पर तांडव कर रहा है.

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