यूरोप इस समय एक बड़े ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, ईरान-इजरायल संघर्ष और वैश्विक गैस सप्लाई पर दबाव ने यूरोपीय देशों को नए ऊर्जा स्रोतों की तलाश के लिए मजबूर कर दिया है। इसी बीच आर्कटिक क्षेत्र में तेल और गैस ड्रिलिंग को लेकर बहस तेज हो गई है। लेकिन अब नॉर्डिक देशों के बड़े निवेशकों और वित्तीय संस्थानों ने यूरोपीय संघ से साफ अपील की है कि वह आर्कटिक ड्रिलिंग पर अपने प्रतिबंधात्मक रुख को कमजोर न करे। डेनमार्क, नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देशों के कई बड़े निवेशकों, पेंशन फंड्स और पर्यावरण समूहों ने यूरोपीय आयोग को एक संयुक्त पत्र भेजा है।
इस पत्र में कहा गया है कि अगर यूरोप ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर आर्कटिक में नए तेल और गैस प्रोजेक्ट्स की अनुमति देता है, तो इससे जलवायु लक्ष्यों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। निवेशकों का तर्क है कि आर्कटिक में शुरू होने वाली नई परियोजनाओं से तुरंत ऊर्जा संकट का समाधान नहीं होगा क्योंकि इन प्रोजेक्ट्स को उत्पादन शुरू करने में दस साल या उससे अधिक समय लग सकता है। नॉर्डिया एसेट मैनेजमेंट और नॉर्वे की बड़ी पेंशन कंपनी KLP जैसे बड़े नाम इस मुहिम में शामिल हैं। इन संस्थाओं का कहना है कि अल्पकालिक ऊर्जा संकट के कारण दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका मानना है कि आर्कटिक दुनिया के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक है और वहां बड़े स्तर पर ड्रिलिंग से तेल रिसाव, समुद्री प्रदूषण और जैव विविधता को अपूरणीय नुकसान हो सकता है।
निवेशकों द्वारा भेजे गए पत्र में बारेंट्स सागर का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार अगर इस क्षेत्र में तेल रिसाव होता है तो 90 प्रतिशत से अधिक तेल को वापस निकालना लगभग असंभव होगा। यही कारण है कि पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि आर्कटिक में तेल और गैस विस्तार भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यूरोप की स्थिति इस समय काफी जटिल हो गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने रूसी गैस पर निर्भरता कम करने की कोशिश शुरू की थी। लेकिन अब मध्य पूर्व संकट और ईरान से जुड़े तनावों ने ऊर्जा बाजार को फिर अस्थिर कर दिया है। यूरोपीय गैस की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है। ऐसे में नॉर्वे, जो यूरोप का सबसे बड़ा गैस सप्लायर बन चुका है, EU पर दबाव बना रहा है कि आर्कटिक ड्रिलिंग को लेकर नरम रुख अपनाया जाए।
नॉर्वे यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन ऊर्जा आपूर्ति के मामले में उसकी भूमिका बेहद अहम है। नॉर्वे का कहना है कि अगर यूरोप को भविष्य में स्थिर ऊर्जा आपूर्ति चाहिए तो उसे आर्कटिक क्षेत्रों में नए तेल और गैस स्रोतों के विकास की अनुमति देनी होगी। नॉर्वे के कई पुराने तेल क्षेत्र अब धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं और आने वाले दशक में उत्पादन घटने की आशंका है। इसलिए वहां की कंपनियां बारेंट्स सागर और अन्य आर्कटिक इलाकों में नए संसाधनों की खोज पर जोर दे रही हैं। पर्यावरण समूह और जलवायु निवेशक इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि दुनिया पहले ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव झेल रही है और ऐसे समय में नए फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स शुरू करना पेरिस जलवायु समझौते की भावना के खिलाफ होगा। कई वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक तापमान वृद्धि के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है और वहां औद्योगिक गतिविधियां बढ़ाने से बर्फ पिघलने की प्रक्रिया और तेज हो सकती है।
यूरोपीय आयोग फिलहाल अपनी आर्कटिक नीति की समीक्षा कर रहा है। EU की मौजूदा नीति आर्कटिक में नए तेल और गैस विकास का विरोध करती है, लेकिन अभी तक कोई औपचारिक कानूनी मोरेटोरियम लागू नहीं किया गया है। आयोग ने कहा है कि बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक हालात को देखते हुए नीति की समीक्षा की जा रही है, लेकिन अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। इस पूरे विवाद में ऊर्जा सुरक्षा बनाम पर्यावरण संरक्षण की बहस फिर तेज हो गई है। एक तरफ यूरोप को स्थिर ऊर्जा सप्लाई की चिंता है, वहीं दूसरी ओर निवेशक और जलवायु संगठन चाहते हैं कि अल्पकालिक संकट के कारण दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं से समझौता न किया जाए। आने वाले महीनों में EU की नई आर्कटिक नीति इस बहस की दिशा तय कर सकती है।





