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भारत का सबसे बड़ा अकाउंटिंग स्कैंडल? राजेश एक्सपोर्ट्स मामले ने हिलाया बाजार

SEBI ने राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रमोटर के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। कंपनी पर विदेशी सहायक कंपनियों के जरिए कथित तौर पर 15.15 लाख करोड़ रुपये का राजस्व बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने, फंड डायवर्जन और संदिग्ध लेन-देन के गंभीर आरोप लगे हैं।

Admin
4/6/2026
भारत का सबसे बड़ा अकाउंटिंग स्कैंडल? राजेश एक्सपोर्ट्स मामले ने हिलाया बाजार

आज बात उस बड़े खुलासे की है जिसने न सिर्फ एक कंपनी बल्कि पूरे भारतीय शेयर बाजार, ऑडिट सिस्टम और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर सवाल उठाए हैं। सोचिए, अगर किसी कंपनी पर 15 लाख 15 हजार करोड़ रुपये की आय बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का आरोप लगे, तो क्या होगा? यह रकम इतनी बड़ी है कि कई राज्यों के सालाना बजट भी इसके सामने छोटे पड़ जाएं। और अब इसी आरोप के केंद्र में है देश की जानी-मानी ज्वेलरी और गोल्ड एक्सपोर्ट कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी SEBI ने कंपनी और उसके प्रमोटर राजेश मेहता के खिलाफ बड़ा एक्शन लिया है। उन्हें सिक्योरिटीज मार्केट में ट्रेडिंग से रोक दिया गया है। SEBI का आरोप है कि कंपनी ने वर्षों तक अपने निवेशकों, बाजार और रेगुलेटर्स के सामने ऐसी तस्वीर पेश की जो वास्तविकता से बहुत अलग थी।

SEBI की जांच से पता चला है कि कंपनी की कुल आय का 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों से दिखाया गया। इनमें सबसे बड़ा नाम है स्विट्जरलैंड की कंपनी Valcambi SA। कंपनी के दस्तावेजों में Valcambi SA को ऐसा दिखाया गया जैसे पूरा कारोबार उसी के दम पर चल रहा हो। लेकिन जब उसके ऑडिटेड खातों की जांच हुई, तो वहां वैसी कमाई दिखाई ही नहीं दी, जैसी राजेश एक्सपोर्ट्स अपने निवेशकों को बता रही थी। यानी भारत में दावा कुछ और, विदेश में रिकॉर्ड कुछ और। SEBI का आरोप है कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये का राजस्व विदेशी सहायक कंपनियों के नाम पर दिखाया गया, जिसका वास्तविक आधार संदिग्ध पाया गया। सवाल उठता है कि क्या यह कारोबार वास्तव में हुआ था या सिर्फ कागजों में दिखाया गया?

SEBI के आदेश में एक और बड़ा खुलासा सामने आया है। कंपनी ने Affluence Shares and Stocks Private Limited नाम की एक संस्था के साथ करीब 11,487 करोड़ रुपये की बिक्री और 11,488 करोड़ रुपये की खरीद दिखाई। लेकिन जब उस संस्था से पूछा गया, तो उसने ऐसे किसी भी लेन-देन से साफ इनकार कर दिया। यानी अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो हजारों करोड़ रुपये की खरीद-बिक्री सिर्फ दस्तावेजों में बनाई गई थी। लेकिन मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। SEBI का आरोप है कि कंपनी के करीब 339 करोड़ रुपये प्रमोटर राजेश मेहता के निजी खातों तक पहुंचे। इनमें से कुछ रकम का इस्तेमाल कथित तौर पर व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग में भी किया गया। इसके अलावा लगभग 926 करोड़ रुपये बिना आवश्यक मंजूरी और खुलासे के ट्रांसफर किए गए। यानी जिस पैसे पर लाखों निवेशकों का हक था, वह कथित तौर पर निजी इस्तेमाल में चला गया।

अब सबसे बड़ा सवाल ऑडिट सिस्टम पर उठ रहा है। आखिर इतने बड़े आंकड़े सालों तक बैलेंसशीट में कैसे घूमते रहे? कंपनी के ऑडिटर क्या देख रहे थे? स्वतंत्र निदेशक क्या कर रहे थे? ऑडिट कमेटी ने सवाल क्यों नहीं उठाए? क्या विदेशी कंपनियों के दस्तावेजों की जांच नहीं हुई? क्या हजारों करोड़ के लेन-देन की पुष्टि नहीं की गई? अगर यह सब हुआ, तो फिर इतनी बड़ी गड़बड़ी पकड़ में क्यों नहीं आई? और अगर नहीं हुआ, तो ऑडिट की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। बैंकिंग सिस्टम भी अब सवालों के घेरे में है। इतनी बड़ी आय दिखाने वाली कंपनी को बैंकों से क्रेडिट, एक्सपोर्ट फाइनेंस और कई वित्तीय सुविधाएं मिलती रही होंगी। क्या बैंकों ने कभी यह जांचने की कोशिश की कि जिस कारोबार का दावा किया जा रहा है, उसका वास्तविक पैसा कहां है? क्या किसी ने निर्यात, भुगतान और विदेशी लेन-देन का मिलान किया? अगर नहीं, तो यह सिर्फ एक कंपनी की नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की भी विफलता है।

और सबसे बड़ा नुकसान किसका हुआ? छोटे निवेशकों का। वे लोग जो कंपनी की बैलेंसशीट, ऑडिटर की मुहर और रेगुलेटरी सिस्टम पर भरोसा करके शेयर खरीदते हैं। SEBI का अनुमान है कि कथित गलत जानकारी और फंड डायवर्जन की वजह से शेयरधारकों की संपत्ति को करीब 12,726 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अब देश की नजर इस जांच पर है। क्या यह सिर्फ एक कंपनी तक सीमित मामला रहेगा? या फिर ऑडिटर, बोर्ड, बैंक और उन सभी लोगों की भूमिका की भी जांच होगी जिनकी मंजूरी और चुप्पी से यह कथित खेल वर्षों तक चलता रहा? क्योंकि अगर लाखों करोड़ रुपये के आंकड़े बिना वास्तविक कारोबार के बैलेंसशीट में घूम सकते हैं, तो यह सिर्फ निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारतीय वित्तीय सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है।

फिलहाल SEBI की कार्रवाई ने बाजार में हलचल मचा दी है, लेकिन असली सवाल अब भी बाकी है—क्या यह भारत के कॉर्पोरेट इतिहास का सबसे बड़ा अकाउंटिंग स्कैंडल साबित होगा, या जांच में कहानी कुछ और निकलेगी?

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