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अब नहीं चलेगी ‘तारीख पर तारीख’! सुप्रीम कोर्ट ने न्याय में देरी पर लिया बड़ा एक्शन

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों में लंबित रिजर्व फैसलों पर चिंता जताते हुए कहा है कि सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। जानिए कोर्ट के नए दिशानिर्देश और इसका आम लोगों पर असर।

Admin
29/5/2026
अब नहीं चलेगी ‘तारीख पर तारीख’! सुप्रीम कोर्ट ने न्याय में देरी पर लिया बड़ा एक्शन

“तारीख पर तारीख”... ये शब्द अब सिर्फ फिल्मों में नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था के बारे में चर्चा में भी सुनने को मिलते हैं। लेकिन अब इस मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सख्त रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों में लंबे समय तक लंबित रहने वाले फैसलों पर चिंता जताई है और स्पष्ट संकेत दिया है कि न्याय में अनावश्यक देरी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने कहा है कि अगर सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है, तो उसे तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। कई मामले सामने आए हैं जिनमें सुनवाई खत्म होने के बाद भी महीनों या वर्षों तक फैसले नहीं आए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था की एक गंभीर समस्या बताया है। जब कोई नागरिक न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो उसे सिर्फ सुनवाई नहीं, बल्कि समय पर फैसला मिलने की भी उम्मीद होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि लंबित फैसले न सिर्फ पक्षकारों की चिंता बढ़ाते हैं, बल्कि न्यायपालिका पर जनता के भरोसे को भी कमजोर करते हैं। इसी वजह से अदालत ने उच्च न्यायालयों में रिजर्व जजमेंट्स की नियमित निगरानी और समयबद्ध निपटारे पर जोर दिया है। प्रस्तावित दिशानिर्देशों के मुताबिक, तीन महीने से ज्यादा समय तक लंबित रिजर्व फैसलों की जानकारी संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक पहुंचाई जाएगी, ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों और सिद्धांतों का हवाला देते हुए दोहराया है कि “न्याय में देर न्याय से वंचित होना है”। अदालत ने कहा है कि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब फैसले उचित समय सीमा के भीतर दिए जाएं। जानकारों का मानना है कि अगर यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होती है, तो लाखों वादियों को राहत मिल सकती है। इससे न सिर्फ न्यायिक जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि अदालतों में पारदर्शिता और कार्यकुशलता भी मजबूत होगी।

तो क्या अब “तारीख पर तारीख” का दौर खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है? क्या अदालतों में वर्षों से अटके रिजर्व फैसलों को गति मिलेगी? और क्या आम नागरिक को समय पर न्याय मिल पाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे, लेकिन इतना जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्याय व्यवस्था में जवाबदेही और भरोसा बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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